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दलित के साथ संगीन अपराध पर SC/ST Act की धाराएं स्वत: ना लगाई जाए: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली. दलितों की सुरक्षा के लिए बनाए गए एससी/एसटी एक्ट (SC/ST Act) पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बड़ी टिप्पणी की है. शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी भी अपराध में जो दलित वर्ग के सदस्य के खिलाफ किया गया हो, एससी/एसटी कानून की धाराएं स्वचालित रूप से सिर्फ इसलिए नहीं लगाई जा सकतीं कि पीड़ित दलित वर्ग से संबंधित है.

सर्वोच्च अदालत ने कहा कि एससी/एसटी कानून की धारा 3 (2) (5) तभी लगाई जा सकती है जब यह बात सामने आए कि अपराध किसी भी व्यक्ति के साथ दलित होने के कारण हुआ है.

जानिए SC/ST एक्ट के बारे में…
धारा 3 (2) (5) कहती है कि गैर अनुसूचित जाति या जनजाति का व्यक्ति अनुसूचित जाति या जनजाति के व्यक्ति के खिलाफ ऐसा अपराध करता है. जिसमें दस साल या उससे अधिक के कारावास या जुर्माने का प्रावधान है तो, ऐसा व्यक्ति उम्रकैद और जुर्माने का भागी होगा.

क्या है एससी एसटी एक्ट?

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों की सुरक्षा के लिए एससी एसटी एक्ट 1 सितम्बर 1989 में संसद द्वारा पारित किया था.

– एससी एसटी एक्ट को पूरे देश में 30 जनवरी 1990 को लागू कर दिया गया.

– इसका उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग से ताल्लुक रखने वाले लोगों को सार्वजनिक सुरक्षा मुहैया कराना है तथा इनके खिलाफ समाज में फैले भेदभाव और अत्याचार को रोकना है.

– इस एक्ट का मकसद एससी-एसटी वर्ग के लोगों को अन्य वर्गों की ही तरह समान अधिकार दिलाना भी है.

– अनुसूचित जाति जनजाति के लोगों के साथ होने वाले अपराधों की सूरत में इस एक्ट में सुनवाई का विशेष प्रावधान किया गया है.

– इसके तहत इस समुदाय के लोगों के साथ भेदभाव या अन्याय करने वाले लोगों को कठिन सजा का भी प्रावधान है.

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दलितों को हमेशा याद रखना चाहिए ‘2 अप्रैल 2018’ का भारत बंद

नई दिल्ली. 2 अप्रैल का दिन भारतीय इतिहास में भारत के नाम दर्ज है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति एक्ट (Scheduled Castes and Scheduled Tribes Act) पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के फ़ैसले के विरोध आज ही के दिन 2018 में दलित संगठनों ने भारत बंद का आह्वान किया था.

भारत बंद (Bharat Band) को कई राजनीतिक दलों और कई संगठनों ने समर्थन भी दिया. भारत बंद के दौरान दलितों ने मांग की अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 में संशोधन को वापस लेकर एक्ट को पहले की तरह लागू किया जाए. 2 अप्रैल को भारत बंद हुआ वह दलित-आदिवासी आंदोलन के इतिहास में यादगार रहेगा. अगर ये भारत बंद नहीं रहता तो दलित समुदाय को सुरक्षा प्रदान करने वाला कानून शायद खत्म होने की कगार पर होता.

2 अप्रैल को भारत बंद हुआ वह दलित-आदिवासी आंदोलन के इतिहास में यादगार रहेगा. यदि यह आंदोलन नहीं होता तो दलित-आदिवासी समुदायों को थोड़ी बहुत सुरक्षा प्रदान करनेवाला एट्रोसिटीज़ का कानून भी शायद खत्म हो चुका होता या खत्म होने की कगार पर होता.

बंद के दौरान कई लोगों की मौत और हिंसा
भारत बंद के दौरान विभिन्न राज्यों में हिंसा देखने को मिली थी, जिसमें अन्य जाति के लोग और दलितों में भारी हिंसा हुई. मध्य प्रदेश के ग्वालियर, भिंड और मुरैना जिले में उपद्रव के दौरान चार लोगों की मौत हुई. ग्वालियर में एक कार्यकर्ता की गोली लगने से मौत हुई थी लेकिन गोली कहां से चली, किसने चलाई, यह आज तक किसी को नहीं पता.

दलित और आदिवासी को दबाने की कोशिश
राजस्थान के अलग अलग पुलिस थानों में उन दलित-आदिवासी कार्यकर्ताओं की सूची तैयार की गई थी जो आंदोलनों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हों, ताकि पता चले कि किसे हिरासत में लिया जाये. कुल मिलाकर दलित और आदिवासी समुदाय को दबाने की कोशिश हुई थी. इसे दलितों की ताकत ही कहा जाएगा कि इस आंदोलन के बाद सत्तासीन सरकार को झुकना पड़ा और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्टे लगाया.

ये जातियां भी आना चाहती हैं OBC की लिस्ट में, आरक्षण है वजह

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में एक बार फिर मराठा आरक्षण को लेकर सुनवाई शुरू हो गई है. मराठा आरक्षण (Maratha Reservation) के बहाने ही सही एक बार फिर देश में आरक्षण पर सवाल उठने लगे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण (Reservations) दिया जा सकता है? क्या राज्यों को यह अधिकार है कि वो किसी जाति विशेष को शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा घोषित कर सकें? इन सवालों पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से राय मांगी थी.

देश में सिर्फ मराठा ही नहीं बल्कि कई ऐसी जातियां हैं जो ओबीसी वर्ग में खुद को लाने की मांग कर रह हैं. मराठा के साथ ही पटेल, जाट और गुर्जर जाति के लोगों को आरक्षण चाहिए. इन सभी जातियों को ओबीसी वर्ग के तहत आरक्षण चाहिए. सभी वर्गों का कहना है कि वो पिछड़े हुए हैं ऐसे में उन्हें समाज के साथ कदम मिलाने के लिए आरक्षण चाहिए.

किस आधार पर मराठाओं को आरक्षण?
मराठाओं को आरक्षण की बात थोड़ी नई है. 2018 में महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार ने गायकवाड़ कमीशन के सुझाव पर मराठों को पिछड़ा मान था. इसके तहत 16 फीसदी आरक्षण की घोषणा की थी. हालांकि उस वक्त पिछड़ वर्ग के लोगों ने गायकवाड़ कमीशन की बातों को बेकार बताया था. इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा. सभी पहलूओं को ध्यान में रखते हुए आरक्षण घटाकर नौकरी में 13 और शिक्षा में 12 फीसदी आरक्षण कर दिया गया. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्टे दे दिया.

गुर्जरों को कैसे मिला आरक्षण?
राजस्थान में अति पिछड़ों की स्टडी के लिए पहली बार 2008 में जसराज चोपड़ा कमेटी का गठन किया गया, जिसमें गुर्जर समेत पांच जातियों को अति पिछड़ा माना और 50 फीसदी से ऊपर विशेष परिस्थतियों में आरक्षण दिए जाने का प्रस्ताव सरकार को भेजा.

इसके बाद 4 साल बाद 2012 में राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया, जिसमें आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर आरक्षण दिए जाने के लिए सरकार को कहा. इसे इसरानी आयोग के नाम से भी जाना जाता है.

2017 में तीसरी बार जस्टिस गर्ग कमेटी का गठन

– तीसरी बार 2017 में जस्टिस गर्ग कमेटी का गठन किया, जिसने भी अध्ययन में यह माना कि अति पिछड़ों को 50 फीसदी के ऊपर आरक्षण की व्यवस्था की जा सकती है.

– सवर्णों ने सुप्रीम कोर्ट ये मांग रखेगा कि जाति के आधार नहीं, बल्कि आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाए. आरक्षण का आधार वो पांच मापदंड रखे जाएं, जो सरकार ने ईडब्लूएस के लिए लागू किया है.

– सवाल अब यह खड़ा होता है कि अगर 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण दिया जा सकता है तो क्या किसी राज्य को यह अधिकार है कि वो किसी जाति विशेष को पिछड़ा घोषित कर दे और उस जाति को आरक्षण दे सके? अगर राज्य को यह अधिकार नहीं है तो 2018 का महाराष्ट्र सरकार द्वारा मराठों को दिया गया आरक्षण अपने आप अवैध हो जाएगा.

 

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सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- शिक्षा और नौकरियों में कितनी पीढ़ियों तक चलेगा आरक्षण

मुंबई. महाराष्ट्र में इन दिनों मराठा आक्षरण (Maratha Reservation) लागू किए जाने पर राजनीतिक तेज हो रही है. मराठा को आरक्षण दिए जानें से पहले सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के एक सवाल पूछा है. शुक्रवार को मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि आखिरकार कितनी पीढ़ियों तक आरक्षण जारी रहेगा. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 50 फीसदी की सीमा हटाए जाने की स्थिति में पैदा होने वाली असमानता को लेकर भी चिंता प्रकट की.

सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि कोटा की सीमा तय करने पर मंडल मामले में (सुप्रीम कोर्ट के) फैसले पर बदली हुई परिस्थितियों को दोबारा से सोचने की आवश्यकता है. इस दौरान रोहतगी ने कहा कि आरक्षण कोटा तय करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार पर छोड़नी चाहिए.

केंद्र सरकार के आरक्षण पर कही ये बात
सुप्रीम कोर्ट में दलील देते हुए रोहतगी ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोगों (ईब्ल्यूएस) को 10 फीसदी आरक्षण देने का केंद्र सरकार का फैसला 50 फीसदी की सीमा का उल्लंघन करता है.

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कितनी पीढ़ियों तक चलेगा आरक्षण
रोहतगी की दलील सुनने के बाद पीठ ने कहा अगर 50 फीसदी की सीमा या कोई सीमा नहीं रहती है, जैसा कि आपने सुझाया है, तब समानता की क्या अवधारणा रह जाएगी. पीठ ने कहा आखिर कितनी पीढ़ियों तक आरक्षण चलता रहेगा.

एक नजर में….

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