Kanshi Ram

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Kanshi Ram ke Vichar: डॉ. बीआर आंबेडकर को लेकर कांशीराम के अनमोल विचार व कथन- पार्ट- 5

भारत रत्‍न बाबा साहेब डॉ. बीआर आंबेडकर (Bharat Ratna Baba Sahab Dr. BR Ambedkar) को लेकर मान्‍यवर कांशीराम (Manyavar Kanshi Ram ke Vichar) के अनमोल विचार व कथन नीचे पढ़ें…

हम यह पहले भी देख चुके हैं कि हमारे समाज में चमचों की बहुतायत ने किस प्रकार आंबेडकरी आंदोलन (Ambedkar Movement) को नष्‍ट कर दिया था. चमचा युग (Chamcha Yug) का एक अनिष्‍टकर प्रभाव यह हुआ कि अनुसूचित जनजातियां अपने ही भले के लिए राजनीतिक शक्ति का इस्‍तेमाल करने की राजनीतिक क्षमता विकसित नहीं कर पाईं.

डॉ. आंबेडकर (Dr. BR Ambedkar) बेहद बुद्धिमान थे कि उन्‍होंने पहले अन्‍य पिछड़ी जातियों की मान्‍यता पर जोर दिया, जबकि गांधी 1930-32 के गोलमेज सम्‍मेलनों (Round Table Conferences of 1930-32) के दौरान बिना मान्‍यता के अधिकारों के लिए बना रहे थे.

अन्‍य पिछड़ी जातियां दावा करती हैं कि वे शून्‍य हैं. कैसी दुखद स्थिति है? कैसे व्‍यापक प्रभाव हैं चमचा युग के?

बहुसंख्‍यकों को अज्ञान और असहायता की स्थिति में रखने की चिंता में, शासक जातियों ने देश को गरीब और पिछड़ा बनाए रखा.

बाबा साहेब डॉ. बीआर आंबेडकर (Baba Sahab Dr. Bhim Rao Ambedkar) दलितों के हक में गरजने वाले पहले दलित वीर थे, जो इंग्‍लैंड की राजधानी लंदन में जाकर भी अपने अधिकारों के लिए तत्‍कालीन हुकूमरानों तथा हिंदुओं के दबंग नेताओं से जा भिड़े.

आज भी जब कमजोर तबके अपनी आवाज, अपना सिर उठाते हैं तो उनका उत्‍पीड़न किया जाता है.

चमचा युग की चुनौती से निपटने के लिए डॉ. आंबेडकर अनेक तरीके और साधन तैयार करने में समर्थ रहे.

इनमें सबसे अच्‍छा तरीका और साधन था उनकी सुनियोजित अवधारण शिक्षित बनो, संगठित रहो तथा संघर्ष करो (Shikshit Bano, Sangathit Raho, Sangharsh Karo).

(Manyavar Kanshi Ram ke Vichar)

Manyavar Kanshi Ram life Changes after going to Poona

Kanshi Ram: जानें, पूना जाने के बाद मान्‍यवर कांशीराम की जिंदगी में क्‍या बड़ा बदलाव आया?

त्याग और निष्ठा का उत्कृष्ट उदाहरण रहे मान्‍यवर कांशीराम (Manyavar Kanshi Ram) के जीवन की यूं तो कई बातें हैं, जो हम सभी को प्रेरित करती हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी किस्‍से हैं, जो बहुजन मिशन (Bahujan Mission) के प्रति उनके विशुद्ध समर्पण को दर्शाते हैं. सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति को अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर वह इस पथ पर ऐसे आगे बढ़े कि इसे पाने के लिए उन्‍होंने अपना सबकुछ समर्पित कर दिया. यहां तक अपना परिवार, सगे-संबंधी सभी.

Kanshi Ram Ke Anmol Vichar: मान्‍यवर कांशीराम के अनमोल विचार, पार्ट- 4

साहेब कांशीराम (Sahab Kanshi Ram) की माता बिशन कौर (Mata Bihsan Kaur) ने अपनी यादों के आधार पर बताया था कि पूना जाने के बाद उनके पुत्र कांशीराम (Kanshi Ram) में काफी बदलाव आए. वह कभी घर आते तो गुमसुम बैठे रहते. खेतों में जाकर किताबें पढ़ते रहते थे. वह बताती हैं कि आखिरी बार जब कांशीराम पूना गए तो काफी समय तक उनका कोई पत्र नहीं आया. वह इससे परेशान हो उठीं.

चमचा बनाने की आवश्यकता… पढ़ें-मान्‍यवर कांशीराम के विचार

माता बिशन कौर (Mata Bihsan Kaur) ने उनके फुफुरे भाई को हाल पता करने को वहां भेजा. फुफुरे भाई ने जब कांशीराम से घर आने को कहा तो मान्‍यवर कांशीराम ने जवाब दिया- घर वालों को बता देना अब मैं घर कभी नहीं आऊंगा. मुझे अपने दबे-कुचले लोगों के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़नी है.

कार्यकर्ता को चमचा समझने की भूल तो नहीं ही करनी चाहिए : मान्‍यवर कांशीराम

बहुजन मिशन (Bahujan Mission) के सच्‍चे सिपाही कांशीराम (Manyavar Kanshi Ram) ने एक 24 पन्‍नों का पत्र भेजकर घरवालों को अपने इस फैसले से भी अवगत कराया. इस पत्र में उन्होंने साफ किया था कि वह कभी शादी नहीं करेंगे. कभी घर नहीं आएंगे. कभी कोई सम्पत्ति नहीं बनाएंगे. किसी भी सामाजिक समारोह जैसे विवाहोत्सव, मृत्युभोज आदि में सम्मिलित नहीं होएंगे और आगे से कोई नौकरी नहीं करेंगे. मान्‍यवर कांशीराम जीवन पर्यन्त अपने उक्‍त फैसले पर कायम रहे. वे अपने पिता की मृत्यु पर भी अपने घर नहीं गए थे.

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जब पहली बार मान्‍यवर कांशीराम ने संसद में प्रवेश किया, हर कोई सीट से खड़ा हो गया था…

Kanshiram ke Vichar: कांशीराम के अनमोल विचार-कथन, पार्ट-3

 

Kanshi Ram Ke Anmol Vichar Kanshi Ram Thoughts

Kanshi Ram Ke Anmol Vichar: मान्‍यवर कांशीराम के अनमोल विचार, पार्ट- 4

मुझे ऐसा लगा कि अगर जिंदगी में हमें किसी दिशा में आगे बढ़ना है, तो शुद्र और अतिशूद्र लोगों को हुक्मरान बनना जरूरी है. इन लोगों की हुकूमत होगी तो ये लोग अपने हिसाब से अपने कारोबार को चलाने लगेंगे, तो तब ही इनकी बात आगे बढ़ सकती है. – मा. कांशीराम (Kanshi Ram Ke Anmol Vichar)

चमचा बनाने की आवश्यकता… पढ़ें-मान्‍यवर कांशीराम के विचार

आज हमारे महापुरुष जिंदा नहीं है. हम लोग जिंदा हैं, इसलिए हम लोगों को उनके एजेंडा को लागू करना है और लागू करने के लिए उस एजेंडा को पहले अच्छी तरह समझना है. – मा. कांशी राम (Bahujan Leader Kanshi Ram)

कार्यकर्ता को चमचा समझने की भूल तो नहीं ही करनी चाहिए : मान्‍यवर कांशीराम

बाबासाहब की मूवमेंट एक शरीर है, जिसमें सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक ये जरूरी अंग है. जिसमें एक को भी छोड़ दिया जाए तो शरीर खराब हो जाएगा और बीमारी बढ़ जाएगी. इसलिए हमें सारी मूवमेंट को एक साथ आगे बढ़ाना है. – मा. कांशी राम (Kanshi Ram Thoughts)

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जब आदमी ईमानदारी से काम करता है तो उसके परिणाम भी बेहतर आते हैं. इसलिए आप लोगों को भी मेरी राय है कि आप लोग भी अपना समय व्यर्थ ना गवाएं और काम करें. जब तुम ईमानदारी से काम करोगे तो कामयाबी तुम्हें सलाम करेगी. – मा. कांशी राम (Kanshi Ram Ke Anmol Vichar)

जब पहली बार मान्‍यवर कांशीराम ने संसद में प्रवेश किया, हर कोई सीट से खड़ा हो गया था…

महामना ज्योतिबा फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज और बाबासाहब के बारे में मैं हमेशा सोचता रहता हूं कि सबसे बड़ा काम जो इन महापुरुषों ने अपनी जिंदगी में किया है, वो काम है, छुआछूत का अंत करने का. फिर उसके बाद अनपढ़ लोगों को पढ़ने-लिखने का मौका.. इसलिए खासकर जो लोग हजारों सालों तक छुआछूत का शिकार रहे उन लोगों को इन तीन चीजों के बारे में जानकारी रखना जरूरी है – छुआछूत का अंत (Abolishment of untouchability) , पढ़ने लिखने की शरुआत, पढ़ने लिखने के बाद आरक्षण (Reservation). ये तीन चीजें हमारे बुजुर्गों के बारे में, इन तीनों महापुरुषों के बारे में, खासकर अछूत कहे जाने वाले लोगों को ऋणी रहना चाहिए. – मा. कांशी राम (Manyawar Kanshi Ram)

कांशीराम ने क्‍यों कहा, ‘हमें चमचों से नहीं डरना’… यह प्रेरक बात जाननी बहुत जरूरी है

पत्रकार का सवाल: क्या आप अपने बहुजन समाज को हिन्दू समाज की मुख्यधारा से अलग मानते हैं ?
कांशीराम: बहुजन समाज ही असली मुख्यधारा है, हिन्दू समाज नहीं. क्योंकि बहुजन समाज इस देश का बहुसंख्यक समाज है.

Kanshiram ke Vichar: कांशीराम के अनमोल विचार-कथन, पार्ट-3

यह ठीक है कि हमारे पास धन-दौलत की कमी है, मगर हमारे पास मुक्कों की कमी नहीं है. अगर हम 85 प्रतिशत मुक्कों को इकठ्ठा करके दुश्मन की नाक पर मार दें तो दुश्मन गुण्डागर्दी अत्याचार के हथकण्डे अपनाने की कोशिश नहीं करेगा. – मा. कांशी राम (Kanshi Ram)

वो बातें, जिसने कांशीराम को दलित राजनीति का चेहरा बना दिया…

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चमचा बनाने की आवश्यकता… पढ़ें-मान्‍यवर कांशीराम के विचार

इस लेख में मान्‍यवर कांशीराम (Manyavar Kanshiram) के विचारों के जरिए जानेंगे कि चमचों की जरूरत क्‍या होती है और इन्‍हें किस तरह तैयार कर खड़ा किया जाता है. दरअसल, कांशीराम साहेब (Manyavar Saheb Shri Kanshiram) कहते हैं कि सच्‍चे, खरे योद्धा का विरोध करने के लिए चमचों को बनाया जाता है. इन चमचों को कांशीराम (Kanshi Ram) औजार, दलाल, पिट्ठू कहा करते थे. उन्‍होंने ‘चमचा युग’ (Chamcha Yug) में लिखा, शुरुआत में उपेक्षित रहे दलित वर्गों (Dalit Varg) का नेतृत्व जब बाद में सशक्त और प्रबल हो गया तो उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकी. तब ऊंची जातियों के हिंदुओं के यह आवश्‍यकता महसूस हुई कि वह दलित वर्गों (Depressed Classes) के सच्चे नेताओं के खिलाफ चमचे खड़े करें. आइये पढ़ते हैं मान्‍यवर कांशीराम द्वारा लिखे गए अनमोल विचार (Kanshi Ram Ke Anmol Vichar)…

कार्यकर्ता को चमचा समझने की भूल तो नहीं ही करनी चाहिए : मान्‍यवर कांशीराम

औजार, दलाल, पिट्ठू अथवा चमचा बनाया जाता है सच्चे, खरे योद्धा का विरोध करने के लिए. जब खरे और सच्चे योद्धा होते हैं, चमचों की मांग तभी होती है. जब कोई लड़ाई, कोई संघर्ष और किसी योद्धा की तरफ से कोई खतरा नहीं होता तो चमचों की जरूरत नहीं होती. उनकी मांग नहीं होती, जैसा कि हम देख चुके हैं. बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में दलित वर्ग लगभग समूचे भारत में छुआछूत और अन्याय पूर्ण सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई को तैयार हो गए थे. प्रारंभ में उनकी उपेक्षा की गई, किंतु बाद में जब दलित वर्गों का नेतृत्व सशक्त और प्रबल हो गया तो उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकी. इस मुकाम पर आकर ऊंची जातियों के हिंदुओं के यह महसूस हुई कि वह दलित वर्गों के सच्चे नेताओं के खिलाफ चमचे खड़े करें.

भूखे-प्‍यासे और साइकिल भी पंचर… मान्‍यवर कांशीराम का 5 पैसे वाला ‘प्रेरक किस्‍सा’

गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conference) के दौरान डॉ. बी आर आंबेडकर (Dr. BR Ambedkar) ने अत्यंत सफलतापूर्वक दलित वर्गों के लिए संघर्ष किया. उस समय तक गांधी जी और उनकी कांग्रेस इस भुलावे में थे कि दलित वर्गों के पास ऐसा कोई सच्चा नेता नहीं था जो उनके लिए लड़ सके. गोलमेज सम्मेलनों के दौरान 19331 के आसपास गांधी जी और उनकी कांग्रेस ने इंच दर इंच अंतिम पल तक दलित वर्गों के राजनीतिक संरक्षण की एक-एक मांग का विरोध किया. किंतु यह डॉक्टर आंबेडकर (Dr. Ambedkar) के नेतृत्व का बूता था कि उन्होंने दलित वर्गों की न्यायोचित मांगों को मनवा लिया. गांधी जी (Gandhi Ji) और कांग्रेस (Congress) के तमाम विरोध के बावजूद 17 अगस्त 1932 को घोषित प्रधानमंत्री के पंचाट में दलित वर्गों को पृथक निर्वाचक मंडल की स्वीकृति दे दी गई. 1930 से 1932 तक की अवधि में गांधीजी और कांग्रेस को पहली बार चमचों की जरूरत महसूस हुई.

जब पहली बार मान्‍यवर कांशीराम ने संसद में प्रवेश किया, हर कोई सीट से खड़ा हो गया था…

Kanshi Ram ke Anmol Vichar: कांशीराम के अनमोल विचार-कथन, पार्ट-3

स्‍त्रोत : चमचा युग (The Chamcha Age)

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