Dalit Sahitya

Sahitya Chetna Manch announces 10 names for 3rd Omprakash Valmiki Smriti Sahitya Samman

साहित्य चेतना मंच ने तृतीय ओमप्रकाश वाल्मीकि स्मृति साहित्य सम्मान के लिए 10 नामों की घोषणा की

नई दिल्‍ली: साहित्यिक संस्था ‘साहित्य चेतना मंच’, सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) ने अपने तृतीय “ओमप्रकाश वाल्मीकि स्मृति साहित्य सम्मान” (Om Prakash Valmiki Smriti Sahitya Samman) के लिए दस नामों की घोषणा कर दी है. यह सम्मान लेखकों के साहित्यिक एवं सामाजिक कार्यों को ध्यातव्य में रखकर चयनित किया जाता है.

Om Prakash Valmiki: वे जानते हैं, यह एक जंग है, जहां उनकी हार तय है… ओमप्रकाश वाल्‍मीकि

साहित्य चेतना मंच (Sahitya Chetna Manch) के अध्यक्ष डॉ. नरेन्द्र वाल्मीकि ने बताया कि इस बार दिल्ली से डॉ. मुकेश मिरोठा और डॉ. नीलम, झारखंड से विपिन बिहारी, उत्तराखंड से डॉ. राजेश पाल, पश्चिम बंगाल से प्रदीप कुमार ठाकुर, हरियाणा से रमन कुमार, राजस्थान से सतीश खनगवाल, तेलंगाना से उषा यादव, गुजरात से डॉ. खन्नाप्रसाद अमीन और उत्तर प्रदेश से बच्चा लाल ‘उन्मेष’ का नाम चयनित किया गया है.

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बता दें कि साहित्य मनीषियों के उत्कृष्ट योगदान हेतु ‘ओमप्रकाश वाल्मीकि स्मृति साहित्य सम्मान’ (Om Prakash Valmiki Smriti Sahitya Samman) 30 जून को साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि जी (Om Prakash Valmiki) के जन्मदिवस के अवसर पर प्रदान किया जाता है. संस्था के महासचिव श्याम निर्मोही ने बताया कि ओमप्रकाश वाल्मीकि के विचारों को जन-जन तक पहुंचाना हमारा उद्देश्य है. यह सम्मान ओमप्रकाश वाल्मीकि के जन्मदिवस 30 जून 2022 को वेब कार्यक्रम में दिया जाएगा.

दरअसल, साहित्य चेतना मंच साहित्य के प्रचार-प्रसार एवं साहित्यकारों को सम्मान देने के लिए एक मंच है.

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Kitni Ajeeb baat hai Dalit Kavit by Dalit women rights Writer Anita Bharti

Dalit Kavita: भीड़ देख जोश उमड़ आता है हमारा, जय भीम के नारों से : अनिता भारती (Anita Bharti)

कितनी अजीब बात है
जब हम सोचने लगते हैं
सिद्धान्त केवल कहने की बात हैं
चलने की नहीं

हम सत्य न्याय समता
लिख देना चाहते है किताबों में
होता है वह हमारे
भाषण का प्रिय विषय
पर उसे नहीं अपनाना
चाहते जीवन में

हम बार-बार कसम
खाते हैं अपने आदर्शों की
देते हैं दुहाई उनकी
भीड़ देख जोश
उमड़ आता है हमारा
जय भीम के नारों से
आंख भर आती है हमारी
गला अवरुद्ध हो जाता है
फफक कर रो उठते हैं हम

दुख तकलीफ उसकी याद कर
जो झेली थी भीम ने उस समय
पर हम आंख मींच लेते उससे
जो अन्याय हमारी आंखों
नीचे घट रहा है

अनिता भारती (Anita Bharti)

दलित स्त्री (Dalit Woman) के प्रश्नों पर निरंतर लेखन करने वालीं चर्चित कहानीकार आलोचक व कवयित्री अनिता भारती (Anita Bharti) दलित लेखक संघ (Dalit Lekhak Sangh) की अध्यक्ष हैं. उनका मानना है कि दलित स्त्री साहित्यकार (Dalit women litterateur) की भूमिका किसी भी सामान्य साहित्यकार से बहुत ही महत्वपूर्ण है. न्‍यूज18 हिंदी की वरिष्‍ठ पत्रकार पूजा प्रसाद (Pooja Prasad) से विशेष बातचीत में अनिता भारती कहती हैं कि ‘दलित लेखन (Dalit Writing) में अगर आप महिला मुद्दों पर बात करती हैं तो आप पर दोहरा हमला होता है. ऐसी महिला के तौर पर आपको स्थापित करने की कोशिश की जाती है जो परिवार को नहीं चाहती और जिम्मेदारियों से विमुख रहती हैं. आपके साहस को तोड़ने की पूरी कोशिश की जाती है. कहा यह जाता है कि महिला लेखिकाएं पुरुषों के खिलाफ हैं जबकि सच तो यह है कि वह पितृसत्ता के खिलाफ हैं. दलित लेखन में महिलाओं की संख्या (Number of women in Dalit writing) तो और ज्यादा कम है, उनके लेखन को तवज्जो नहीं दी जाती. देखा यह भी गया है कि साहित्य में सवर्ण स्त्रियों का वर्चस्व है और वह नारी होने के बावजूद गैर सवर्ण नारियों को इस दायरे में नहीं आने देना चाहती’.

अनिता भारती को 1994 में राधाकृष्णन शिक्षक पुरस्कार, 2007 में इन्दिरा गांधी शिक्षक सम्मान, 2008 में दिल्ली राज्य शिक्षक सम्मान, 2010 में दलितआदिवासी पत्रिका द्वारा विरसा मुंडा सम्मान, 2011 में दलित साहित्य एवं सांस्कृतिक अकादमी द्वारा वीरांगना झलकारी बाई सम्मान से नवाजा गया. वहीं, 2015 में रमणिका फाउंडेशन द्वारा सावित्रीबाई फुले सम्मान से सम्मानित किया गया और इसके बाद 2016 में स्त्रीकाल पत्रिका दवारा सावित्रीबाई फुले सम्मान से नवाजा गया. पिछले ही साल उन्हें पुरवैया संस्था द्वारा सावित्रीबाई फुले सम्मान से सम्मानित किया गया.

Dalit Kavita Dalit Sahitya om prakash valmiki Unhe Darr hai Sadiyon ka sanptap

Om Prakash Valmiki: वे जानते हैं, यह एक जंग है, जहां उनकी हार तय है… ओमप्रकाश वाल्‍मीकि

ओमप्रकाश वाल्‍मीकि (सदियों का संताप) Om Prakash Valmiki, Sadiyon ka sanptap

उन्हें डर है
बंजर धरती का सीना चीर कर
अन्न उगा देने वाले सांवले खुरदरे हाथ
उतनी ही दक्षता से जुट जाएंगे
वर्जित क्षेत्र में भी
जहां अभी तक लगा था उनके लिए
नो-एंटरी का बोर्ड

वे जानते हैं
यह एक जंग है
जहां उनकी हार तय है
एक झूठ के रेतीले ढूह की ओट में
खड़े रहकर आख़िर कब तक
बचा जा सकता है बाली के
तीक्ष्ण बाणों से

आसमान से बरसते अंगारों में
उनका झुलसना तय है

फिर भी
अपने पुराने तीरों को वे
तेज़ करने लगे हैं

चौराहों से वे गुज़रते हैं
निश्शंक

जानते हैं
सड़कों पर क़दमताल करती
ख़ाकी वर्दी उनकी ही सुरक्षा के लिए तैनात है

आंखों पर काली पट्टी बाँधे
न्यायदेवी ज़रूरत पड़ने पर दोहराएगी
दसवें मण्डल का पुरूष सूक्त

फिर भी,
उन्हें डर है
भविष्य के गर्भ से चीख़-चीख़ कर
बाहर आती हज़ारों साल की वीभत्सता
जिसे रचा था उनके पुरखों ने भविष्य निधि की तरह
कहीं उन्हें ही न ले डूबे किसी अंधेरी खाई में
जहाँ से बाहर आने के तमाम रास्ते
स्वयं ही बंद कर आए थे
सुग्रीव की तरह

वे खड़े हो गए हैं रास्ता रोक कर
चीख़ रहे हैं
ऊंची आवाज़ में उनके खिलाफ़
जो खेतों की मिट्टी की खुशबू से सने हाथों
से खोल रहे हैं दरवाज़ा
जिसे घेर कर खड़े हैं वे
उनके सफ़ेद कोट पर ख़ून के धब्बे
कैमरों की तेज़ रोशनी में भी साफ़
दिखाई दे रहे हैं

भीतर मरीज़ों की कराहटें
घुट कर रह गई हैं
दरवाज़े के बाहर सड़क पर उठते शोर में उच्चता और योग्यता की तमाम परतें
उघड़ने लगी हैं

ओमप्रकाश वाल्‍मीकि, Om Prakash Valmiki

Suraj Kumar Bauddh Dalit Kavita Dalit Poem Unse keh do ki dare nhi hain hum

उनसे कह दो कि डरे नहीं है हम… हां, हारे हैं जरूर मगर मरे नहीं हैं हम

मगर मरे नहीं हैं हम।

उनसे कह दो कि डरे नहीं है हम,
हारे हैं जरूर मगर मरे नहीं हैं हम।

बहुत जुनून है मुझमें नाइंसाफी के खिलाफ,
सर फिरा है मगर सरफिरे नहीं हैं हम।

बहुत ऊंचा पहाड़ है, है फ़तह बहुत मुश्किल,
अभी से हार क्यों माने अगर चढ़े नहीं हैं हम।

वर्ण/जाति के बल पर उच्चता न दिखाओ,
हमारी जंग जारी है अभी ठहरे नहीं है हम।

द्रोणाचार्य अब अंगूठा नहीं फांसी मांगते हैं,
एकलव्य के वारिस हैं पर भोले नहीं हैं हम।

दो कौड़ी के दाम से मेरा जमीर मत खरीदो,
अमानत में खयानत कर बिके नहीं हैं हम।

एक रोहित की मौत से हमे खामोश मत समझो,
अब हजार रोहित निखरेंगे, बिखरे नहीं हैं हम।

जम्हूरियत में तानाशाही की चोट ठीक नहीं,
कल भी इंकलाबी थे, अभी सुधरे नहीं हैं हम।

उनसे कह दो कि डरे नहीं है हम,
हाँ, हारे हैं जरूर मगर मरे नहीं हैं हम।

– सूरज कुमार बौद्ध (Suraj Kumar Bauddh)

झाड़ू जलाते हुए, कलम उठाते हुए, हम शासक बनने की ओर अग्रसित हैं… पढ़ें, सूरज कुमार बौद्ध (Suraj Kumar Bauddh) की कविता