Punjab and Haryana High Court

Caste comment case Yuvraj Singh not cooperating in investigation PP told Punjab and Haryana High Court

जातिगत टिप्‍पणी मामला: युवराज सिंह नहीं कर रहे जांच में सहयोग, सरकारी वकील ने हाईकोर्ट को बताया

नई दिल्‍ली: अनुसूचित जाति समाज (Scheduled Caste Community) के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने के मामले में दर्ज केस को खारिज करने के लिए क्रिकेटर युवराज सिंह (Yuvraj Singh) द्वारा दायर अर्जी पर शुक्रवार को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट (Punjab and Haryana High Court) में सुनवाई हुई. युवराज पर हरियाणा (Haryana) के हांसी थाना (Hansi Police Station) शहर में अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार अधिनियम (SC/ST Act) व भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं के तहत मामला दर्ज है.

सुनवाई के दौरान युवराज सिंह (Yuvraj Singh) की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता पुनीत बाली ने हाईकोर्ट की बेंच के समक्ष कहा कि वे इस मामले में एक रिजॉइंडर फाइल करना चाहते हैं इसलिए उन्हें समय दिया जाए, जिस पर शिकायतकर्ता वकील रजत कलसन (Advocate Rajat Kalsan) के अधिवक्ता अर्जुन श्योराण ने कहा कि इस मामले में पहले ही बहुत समय दिया जा चुका है तथा आज की पेशी अंतिम बहस के लिए मुकर्रर थी और वे इस मामले में बहस करना चाहते हैं, इसलिए इस मामले में बहस सुनी जाए.

इस दौरान बेंच ने सरकारी वकील से जांच का स्टेटस पूछते हुए कहा कि क्या युवराज सिंह को और जांच में शामिल किया गया है? इस पर सरकारी वकील ने आरोप लगाया कि युवराज सिंह एक बार जांच में शामिल हुए हैं. उनकी तरफ से जांच में सहयोग नहीं किया जा रहा है और तथा ना ही उनकी तरफ से अपना मोबाइल फोन पुलिस को सौंपा गया है.

इस पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट (Punjab and Haryana High Court) ने युवराज सिंह के वकील को फटकार लगाते हुए कहा कि अगर आप जांच में सहयोग नहीं करेंगे तो अदालत इस मामले में युवराज सिंह के खिलाफ सख्त कार्रवाई के बारे में लगाई गई रोक को हटाने से गुरेज नहीं करेगी. इस पर युवराज सिंह के वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता युवराज सिंह दुबई गए हैं और आते ही वह जांच में शामिल होकर पूरा सहयोग करेंगे.

शिकायतकर्ता के अधिवक्ता अर्जुन श्योराण ने अदालत से कहा कि इस मामले की अगली सुनवाई की जल्‍द ही कोई तारीख दी जाए, जिस पर कोर्ट ने अगली तारीख 6 सितंबर मुकर्रर की.

गौरतलब है कि युवराज ने अनुसूचित जाति समाज के खिलाफ अपमानजनक व आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल किया था, जिसके चलते उसके खिलाफ दलित अधिकार कार्यकर्ता रजत कलसन ने हांसी थाना शहर में एससी एसटी एक्ट व आईपीसी की विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया था. इस मुकदमे को खारिज कराने के लिए युवराज सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिस पर हाईकोर्ट ने युवराज के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी.

Bhatla social boycott case Arrest warrant issued against 6 including sarpanch representative

भाटला सामाजिक बहिष्कार मामला: सरपंच प्रतिनिधि सहित 6 के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी

हांसी : भाटला सामाजिक बहिष्कार मामले (Bhatla Social Boycott Case) में हिसार (Hisar) की अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार अधिनियम (Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act) के तहत स्थापित विशेष अदालत के जज अजय तेवतिया ने सामाजिक बहिष्कार के आरोपी सरपंच प्रतिनिधि पुनीत कुमार, रामचंद्र, राम सिंह, जयकिशन, लीला व सुमेर के गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं.

सामाजिक बहिष्कार के पीड़ित दलितों (Dalits) के अधिवक्ता रजत कलसन (Advocate Rajat Kaslan) ने बताया कि 10 जुलाई 2017 को सरपंच समेत 7 लोगों के खिलाफ भाटला के दलितों का सामाजिक बहिष्कार (Bhatla Social Boycott Case) करने के आरोप में मुकदमा दर्ज हुआ था, जिस बारे में आईपीएस राजेश कुमार के नेतृत्व में एक विशेष जांच टीम गठित हुई थी, जिसने केवल एक आरोपी चंद्र फौजी को आरोपी बनाकर अदालत में चालान दे दिया था तथा सरपंच प्रतिनिधि पुनीत कुमार समेत बाकी सभी छह आरोपियों को क्लीन चिट दे दी थी.

उन्‍होंने कहा कि पुलिस की इस कार्रवाई के खिलाफ खिलाफ पीड़ित पक्ष ने तत्कालीन अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डीआर चालिया की अदालत में भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत याचिका दायर कर उन्हें आरोपी बनाकर अदालत में तलब करने की मांग की थी, जिस पर अदालत ने सरपंच प्रतिनिधि समय छह लोगों को आरोपी मानते हुए उन्हें समन जारी किए थे.

उन्‍होंने बताया कि इस पर सरपंच प्रतिनिधि समेत छह आरोपियों ने पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट (Punjab and Haryana High Court) में खुद को तलब किए जाने के निचली अदालत के आदेश के खिलाफ एक रिवीजन पिटिशन दायर की थी, जिसमें पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने केवल एक तारीख के लिए रोक लगा दी थी. उसके बाद से कोरोना के चलते उक्त मामले में कोई सुनवाई नहीं हुई तथा उक्त आदेश ही चला आ रहा था.

कलसन ने बताया कि हाल में ही माननीय सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने इंडियन रेसुरफेसिंग ऑफ रोड एजेंसी बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के मामले में 21 जुलाई 2021 को आदेश पारित कर कहा था कि जिन मामलों में हाईकोर्ट ने स्टे जारी किए हैं, वह स्टे छह महीने के बाद प्रभावी नहीं रहेंगे.

गत छह अगस्त को भाटला समाजिक बहिष्कार मामले में हिसार की अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार अधिनियम के तहत स्थापित विशेष अदालत में सुनवाई हुई, जिसमें पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता ने अदालत से मांग की की धारा 319 के तहत तलब किए गए आरोपियों के द्वारा हाईकोर्ट से स्टे हासिल किया गया था. मैं केवल एक तारीख पेशी के लिए था तथा सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार अब उक्त स्टे प्रभावी नहीं है, जिसके बाद विशेष अदालत ने सरपंच प्रतिनिधि पुनीत कुमार समेत छह आरोपियों की गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए है.

विशेष बात यह है कि अदालत ने गिरफ्तारी वारंट व हांसी की एसपी को निर्देशित कर जारी किए हैं. अब अगली तारीख 24 सितंबर से पहले पुलिस को आरोपियों को गिरफ्तार करना होगा.

Punjab and Haryana High Court SC ST Act

फोन पर जातिसूचक टिप्पणी करना SC/ST ACT के तहत अपराध नहीं : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट (Punjab and Haryana High Court) की एकल पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि अगर व्‍यक्ति अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) समुदाय के किसी व्यक्ति के खिलाफ फ़ोन पर जातिसूचक टिप्पणी करता है तो यह अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) के तहत अपराध नहीं है.

न्यायमूर्ति हरनेश सिंह गिल (Justice Harnesh Singh Gill) की सिंगल बेंच ने बीते 14 मई को यह फ़ैसला दिया.

जस्टिस हरनेश ने अपने फैसले में स्‍पष्‍ट किया कि इस प्रकार की टिप्पणी का आशय शिकायतकर्ता को अपमानित करना नहीं है, क्योंकि ऐसा आम लोगों की नज़रों से दूर किया.

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दरअसल, इस मामले में निचली अदालत के एक फ़ैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें कुरुक्षेत्र, हरियाणा (Kurukshetra, Haryana) के दो लोगों के ख़िलाफ़ अपराध तय किया गया था. उन्‍होंने गांव के सरपंच को फोन पर जातिसूचक गालियां देते हुए जान से मारने की धमकी दी थी.

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि, ‘आम लोगों की नज़रों से दूर इस तरह के शब्दों को केवल बोलने से शिकायतकर्ता को अपमानित करने की इच्छा स्पष्ट नहीं होती. सरपंच अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) से ताल्‍लुक रखते हैं. इस प्रकार यह तथ्यात्मक रूप से अपराध की श्रेणी में नहीं आता, जिसका एससी/एसटी अधिनियम (SC/ST ACT) के तहत संज्ञान लिया जाए.’

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जस्टिस गिल ने अपने फैसले में स्‍प‍ष्‍ट करते हुए कहा कि इस एक्‍ट के तहत यह ज़रूरी है कि आरोपी ने एससी/एसटी समुदाय के किसी व्यक्ति को अपमानित करने के उद्देश्य से डराया धमकाया हो. ऐसा तभी माना जाएगा, जब इस तरह की टिप्पणी सार्वजनिक रूप से सार्वजनिक स्थल पर आम लोगों की मौजूदगी में की जाए.

फैसले में लिखा गया कि, ‘एक बार जब यह स्वीकार कर लिया गया है कि यह कथित बातचीत मोबाइल फोन पर हुई और आम लोगों के बीच नहीं हुई और न ही इसे किसी तीसरे पक्ष ने सुना है, ऐसी स्थिति में जातिसूचक शब्द के प्रयोग के बारे में यह नहीं कहा आजा सकता कि ऐसा सार्वजनिक रूप से कहा गया.’

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जानिए क्‍या था पूरा मामला
दरअसल, 26 अक्टूबर 2017 को संदीप कुमार और प्रदीप कुमार के विरुद्ध सरपंच राजिंदर कुमार ने IPC और SC/ST Act के तहत मामला दर्ज कराया था. निचली अदालत ने बीते 9 मई 2019 को इनके ख़िलाफ़ चार्ज फ्रेम करने के आदेश दिए थे.

इसके ख़िलाफ़ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में अपील की थी. अदालत ने याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ दायर एफआईआर को निरस्त कर दिया और उसके ख़िलाफ़ निर्धारित मामले को भी ख़ारिज कर दिया था.

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