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Bahujan Nayak Periyar Lalai Singh Yadav who known as Periyar of North India

बहुजन नायक ललई सिंह यादव, जो उत्तर भारत के ‘पेरियार’ कहलाए…

पेरियार ललई सिंह यादव (Periyar Lalai Singh Yadav) भारत में ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के खिलाफ सड़क से लेकर अदालत तक लड़ाई लड़ने वाले अगुआ नायकों में एक रहे हैं. उन्‍हें हिन्दू जाति व्यवस्था से इतनी नफरत थी कि उन्होंने अपने नाम से ‘यादव’ शब्द तक हटा दिया था. वे हिंदी पट्टी में उत्तर भारत के पेरियार के रूप में प्रसिद्ध हुए. दरअसल, ललई सिंह पेरियार की चर्चित किताब ‘सच्ची रामायण’ (Sacchi Ramayana) को हिंदी में लाने और उसे पाबंदी से बचाने के लिए लंबा संघर्ष करने वाले बहुजन क्रांति के नायक हैं. 1968 में ललई सिंह ने ‘द रामायना: ए ट्रू रीडिंग’ का हिन्दी अनुवाद कराया और उसे ‘सच्ची रामायण’ नाम से प्रकाशित करवाया. पेरियार की सच्ची रामायण का हिंदी अनुवाद आते ही उत्तर भारत में एक बड़ा तूफान उठ खड़ा हुआ था. इस किताब की इतनी चर्चा हुई कि हिन्दू धर्म के तथाकथित रक्षक भड़क उठे और इसके विरोध में सड़कों पर उतर आए. नतीजतन, तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार (Uttar Pradesh Govt) ने दबाव में आकर 8 दिसंबर 1969 को धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप में किताब को जब्त कर लिया और यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में गया.

ब्राह्मणवाद (Brahminism) के खिलाफ आजीवन संघर्ष करने वाले ‘पेरियार’ ललई सिंह (Periyar Lalai Singh Yadav) को आज उनके जन्‍मदिवस (इनका जन्‍म 1 सितम्बर 1911 को हुआ था) पर श्रद्धांजलि देते हुए dalitawaaz.com की ओर से यह लेख उन्‍हें समर्पित…

बहुजन नायक पेरियार ललई सिंह (Bahujan Nayak Periyar Lalai Singh) का जन्म 1 सितम्बर 1911 को कानपुर देहात के झींझक रेलवे स्टेशन के पास कठारा गांव में हुआ. 1933 में वह मध्‍यप्रदेश के ग्वालियर के सशस्त्र पुलिस बल में सिपाही के रुप में भर्ती हुए, लेकिन कांग्रेस के स्वराज का समर्थन करने के कारण, जिसे ब्रिटिश हुकूमत में जुर्म माना जाता था, उन्‍हें दो साल बाद बर्खास्त कर दिया गया. हालांकि अपील पर उन्‍हें बहाल कर दिया गया. उन्होंने ग्वालियर में 1946 में ‘नान-गजेटेड मुलाजिमान पुलिस एण्ड आर्मी संघ’ की स्थापना की, जिसका मकसद उच्च अधिकारियों से लड़ते हुए पुलिसकर्मियों की समस्याएं उठाना था.

ललई सिंह ने साल 1946 में ‘सिपाही की तबाही’ नामक एक किताब लिखी. हालांकि यह प्रकाशित तो नहीं हो पाई, लेकिन उसे टाइप करते हुए सिपाहियों में बांट दिया गया. हालांकि सेना इंस्पेक्टर जनरल को जैसे ही इस किताब के बारे में पता चला तो उनकी ओर से उसे जब्त कर लिया गया.

करीब एक साल बाद ललई सिंह ने ग्वालियर पुलिस और आर्मी में हड़ताल करा दी, जिसके चलते उन्‍हें 29 मार्च 1947 को गिरफ्तार कर लिया गया. उन पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें 5 साल की सश्रम सजा सुनाई गई. वह 9 महीने तक जेल में रहे. भारत के आजाद होने पर ग्वालियर स्टेट के भारत गणराज्य में विलय के बाद वह 12 जनवरी 1948 को जेल से रिहा कर दिए गए.

साल 1950 में सरकारी सेवा से मुक्त होने के बाद ललई सिंह ने अपना जीवन पूरी तरह बहुजन समाज की मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया. उन्हें इसका आभास हो चुका था कि ब्राह्मणवाद के खात्मे के बिना बहुनजों की मुक्ति नहीं हो सकती.

इसके बाद पेरियार से पहली मुलाकात के समय ही ललई सिंह ने उनकी पुस्तक ‘रामायण : ए ट्रू रीडिंग’ को हिंदी में प्रकाशित करने का मन बना लिया था. इसके लिए उन्होंने पेरियार से चर्चा की और उन्‍हें सहमति मिल गई. 1968 में ही ललई सिंह ने ‘द रामायना: ए ट्रू रीडिंग’ का हिन्दी अनुवाद कराकर ‘सच्ची रामायण’ नाम से प्रकाशित कराया, जिसको लेकर काफी बवाल हुआ और हिंदूवादियों ने विरोध जताया और सरकार ने किताब को जब्‍त कर लिया. मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में गया.

यूपी सरकार की तरफ से कोर्ट में कहा गया कि यह किताब विशाल हिंदू जनसंख्या की पवित्र भावनाओं पर प्रहार करती है और लेखक ने खुली भाषा में राम और सीता एवं जनक जैसे दैवी चरित्रों पर कलंक मढ़ा है. इसलिए इस किताब पर प्रतिबंध लगाना जरूरी है. इस पर ललई सिंह यादव के वकील बनवारी लाल यादव ने ‘सच्ची रामायण’ के पक्ष में जबर्दस्त पैरवी की. 19 जनवरी 1971 को हाईकोर्ट से वह केस जीते. कोर्ट ने किताब जब्ती का आदेश निरस्त कर दिया और सरकार को निर्देश दिया कि वह सभी जब्त पुस्तकें वापस करे. साथ ही ललई सिंह को 300 रुपए मुकदमे का खर्च दिया जाए.

बाद में यूपी सरकार इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट अपील में गई. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में ‘उत्तर प्रदेश बनाम ललई सिंह यादव’ नामक फ़ैसला 16 सितम्बर 1976 को आया, जोकि पुस्तक के प्रकाशक के पक्ष में रहा. सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले को सही माना और राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया.

सच्ची रामायण के पक्ष में मुकदमा जीतने के बाद वह दलितों (Dalit) के नायक बन गए. उन्‍होंने वर्ष 1967 में हिंदू धर्म का त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया और अपने नाम से यादव शब्द हटा दिया. इसके पीछे उनकी गहरी जाति विरोधी चेतना थी, जिसका मकसद जाति विहीन समाज के लिए संघर्ष था.

उन्‍होंने बौद्ध धर्मानुयायी बहुजन राजा अशोक के आदर्श को ध्‍यान में रखते हुए ‘अशोक पुस्तकालय’ नाम से प्रकाशन संस्था कायम की और अपना प्रिन्टिंग प्रेस लगाई, जिसका नाम ‘सस्ता प्रेस’ रखा. उन्होंने पांच नाटक लिखे, अंगुलीमाल नाटक, शम्बूक वध, सन्त माया बलिदान, एकलव्य और नाग यज्ञ नाटक. गद्य में भी उन्होंने तीन किताबें लिखीं, शोषितों पर धार्मिक डकैती, शोषितों पर राजनीतिक डकैती एवं सामाजिक विषमता कैसे समाप्त हो?

ललई सिंह के साहित्य ने बहुजनों में ब्राह्मणवाद के विरुद्ध विद्रोही चेतना पैदा की और उनमें श्रमण संस्कृति और वैचारिकी का नवजागरण किया. एक सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और प्रकाशक के रूप में उन्होंने अपना पूरा जीवन ब्राह्मणवाद के खात्मे और बहुजनों की मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया. 7 फरवरी 1993 को उन्होंने अंतिम विदा ली.

Dalit Success Story Dalit IPS officer Praveen Kumar who gave new identity to Dalits

Dalit Success Story: दलित IPS ऑफि‍सर प्रवीण कुमार, जिन्‍होंने दलितों को नई पहचान दी

“मैं अपने शेष जीवन का उपयोग महात्मा फुले दंपत्ति, बाबा साहब डॉ. बी आर आंबेडकर, कांशीराम और सामाजिक न्याय के लिए मशाल जलाने वाले अन्‍य महापुरुषों के अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए करूंगा “… एक दलित आईपीएस अफसर आरएस प्रवीण कुमार (Senior Dalit IPS officer Dr RS Praveen Kumar) ने अपने पद से रिजाइन देने के बाद ये महान विचार सोशल मीडिया पर व्‍यक्‍त किए. प्रवीण कुमार ने मुख्य सचिव सोमेश कुमार को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की मांग करने वाला पत्र सौंपने के बाद अपने सोशल मीडिया पोस्ट में यह बात कही. (Dalit Success Story)

दलित IPS आरएस प्रवीण कुमार (Senior Dalit IPS officer Dr RS Praveen Kumar) वो हैं, जिन्‍होंने दलितों को नई पहचान दी है. जब वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी डॉ आरएस प्रवीण कुमार (IPS RS Praveen Kumar) ने बीते सोमवार को सरकारी सेवा से स्वेच्छा से पद छोड़ने की घोषणा की, तो यह निश्चित रूप से तेलंगाना सामाजिक कल्याण आवासीय शिक्षण संस्थानों (Telangana Social Welfare Residential Educational Institutions Society (TSWREIS) के असंख्य छात्रों के लिए एक बड़ा झटका था. TSWREIS को प्रवीण कुमार ने पिछले नौ वर्षों में उत्कृष्टता के संस्थानों में बदल दिया है.

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दरअसल, तेलंगाना सरकार ने अनुसूचित जाति (एससी) समुदायों के सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को ध्‍यान में रखते हुए बिना किसी आर्थिक बोझ के एससी समुदायों के लिए अलग स्कूल शुरू किए थे, जिसका मकसद अनुसूच‍ित जाति के छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक बेहतर पहुंच प्रदान करना है. इसके तहत मुख्य रूप से अनुसूचित जाति समुदायों के आबादी वाले क्षेत्रों में समाज कल्याण आवासीय विद्यालयों की स्थापना की गई. २६८ विघालय/शिक्षण संस्‍थान वाली यह सोसायटी १५०००० छात्रों को स्नातक तक अंग्रेजी माध्यम में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करती.

यह एक निर्विवाद तथ्य है कि तेलंगाना सोशल वेलफेयर रेजिडेंशियल एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस सोसाइटी (TSWREIS) के सचिव के रूप में प्रवीण कुमार ने दलितों के लिए कम से कम तेलंगाना में पिछले नौ वर्षों में एक नई पहचान क्रांति की है.

दरअसल, प्रवीण कुमार को दलित शब्द पसंद नहीं है. उनके अनुसार दलित शब्द हाशिये पर पड़े वर्गों पर उत्पीड़न के प्रतीक के रूप में थोपा गया था, इसलिए उन्होंने एक नया शब्द गढ़ा – SWAERO, जिसमें SW का अर्थ समाज कल्याण और “एयरो” आकाश के लिए प्रयोग किया गया. उनका मानना है कि अवसर दिए जाने पर अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए आकाश तक सीमा है.

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TSWRERIS के सचिव के रूप में कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि समाज कल्याण संस्थानों के सभी छात्र अपने नाम के साथ “Swaero” अवश्य जोड़े. यहां तक आईपीएस अधिकारी ने खुद के नाम के आगे भी स्‍वेरो शब्‍द जोड़ा है. इस तरह उनका नाम डॉ आर एस प्रवीण कुमार स्वेरो है.

केवल उनके छात्र ही नहीं, तेलंगाना में पूरे दलित समुदाय के लिए स्वेरो शब्द एक चर्चा का विषय बन गया है, जिससे उन्हें एक नई पहचान मिली है. वे अब खुद को “स्वारोस” कहने में गर्व महसूस करते हैं और अपने दैनिक जीवन में उनका उल्लेख करते हैं, चाहे वह शादी के कार्ड में हो या उनके व्यावसायिक उपक्रमों में या अन्य व्यवसायों में.

प्रवीण कुमार ने एक स्वेरो एंथम भी बनाया है, जिसे समाज कल्याण संस्थानों के छात्र हर दिन पढ़ते हैं, ताकि उन्‍हें अपनी पहचान की भावना महसूस हो और उन्हें अपनी वास्तविक क्षमता को फिर से खोजने में मदद मिल सके. उन्होंने छात्रों के लिए 10 आज्ञाएं भी बनाई हैं, जिनमें पहली कहती है: “मैं किसी से कम नहीं हूं,” और अंतिम कहती है: “मैं कभी हार नहीं मानूंगा.”

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पिछले कुछ वर्षों में, यह “Swaero आंदोलन” सोशल मीडिया और सार्वजनिक अभियान के माध्यम से पिछड़े वर्गों में फैल गया है. यह अब एक जन आंदोलन के रूप में बन गया है, जिसने उन्हें समाज में उनके लिए गर्व और सम्मान की भावना खोजने में मदद की है.

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र, 1995-बैच के आईपीएस अधिकारी डॉ. प्रवीण कुमार का मानना था कि हाशिए पर पड़े वर्गों के उत्थान के लिए अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा ही एकमात्र तरीका है. यही कारण है कि उन्होंने सामाजिक कल्याण आवासीय संस्थानों में शैक्षिक मानकों को बेहतर बनाने के लिए बहुत प्रयास किए.

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वे शैक्षिक विशेषज्ञों को सेवाओं में लाए, अध्यापन में नवीनतम रुझानों की शुरुआत की और शिक्षकों को लगातार नई शिक्षण विधियों को अपनाने की तरफ लगे रहे. उनके प्रयासों ने छात्रों के आत्मविश्वास को इतना बढ़ाया कि कई सामाजिक कल्याण संस्थानों के छात्र तथाकथित कॉन्वेंट स्कूलों के कई छात्रों की तुलना में धाराप्रवाह और बेहतर अंग्रेजी बोल सकते हैं.

न केवल शिक्षाविदों में प्रवीण कुमार ने अपने छात्रों के सर्वांगीण विकास पर भी ध्यान केंद्रित किया और उन्हें खेल, साहसिक खेलों और अन्य पाठ्येतर गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया. निजामाबाद जिले के एक आदिवासी छात्र मालवथ पूर्णा को दिए गए उनके अपार प्रोत्साहन को कौन भूलेगा, जो 2014 में दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह करने वाली दुनिया की सबसे कम उम्र की लड़की बनी थी. प्रवीण कुमार के पूर्णा को प्रोत्साहन से प्रेरणा लेते हुए कई दलित छात्रों ने पर्वतारोहण और घुड़सवारी और एथलेटिक्स जैसे खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है.

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23 नवंबर, 1967 को महबूबनगर जिले के आलमपुर में एक गरीब परिवार में जन्मे प्रवीण कुमार अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता, शिक्षकों को देते हैं, जिन्होंने उन्हें गरीबी, अपमान और सामाजिक भेदभाव का सामना करते हुए एक आईपीएस अधिकारी के रूप में तैयार किया. उन्होंने पशु चिकित्सा विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की, हार्वर्ड विश्वविद्यालय गए और एडवर्ड एस मेसन फेलो बन गए.

लगभग 17 वर्षों तक पुलिस सेवा में रहने के बाद प्रवीण कुमार ने हाशिए के वर्गों के छात्रों की सेवा करने के अपने सपने को साकार करने के लिए TSWREIS में काम करने का विकल्प चुना.

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Dalit Sweeper Asha Kandara became RAS officer passed RAS Exam 2018

Asha Kandara : सड़कों पर झाडू लगाने वाली दलित बहन आशा कंडारा ने किया नाम रोशन, बनीं RAS अधिकारी

जोधपुर. बाबा साहब डॉ. बीआर आंबेडकर (Babasaheb Dr. BR Ambedkar) द्वारा आगे बढ़ने के लिए शिक्षित होने की दी गई प्रेरणा से दलित समाज (Dalit Society) नित नई ऊंचाईयां छू रहा है. तमाम सामाजिक एवं आर्थिक कठिनाईयों के बावजूद शिक्षित होकर दलित समाज के युवा प्रतियोगी परीक्षाओं में अव्‍वल स्‍थान पाकर बड़े अधिकारी के रूप में चयनित हो रहे हैं. राजस्‍थान से भी एक ऐसी ही मिसाल सामने आई है, जिसने दलित समाज का सिर ऊंचा करने एवं युवाओं को कड़ी मेहनत कर सफल होने का प्रमाण दिया है. जोधपुर की सफाईकर्मी आशा कंडारा (Asha Kandara) ने राजस्थान की सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षा आरएएस परीक्षा- 2018 (RAS Exam- 2018) में सफलता का परचम लहराया है. राजस्थान लोकसेवा आयोग की ओर से मंगलवार रात को घोषित किए आरएएस परीक्षा-2018 के परिणामों में आशा ने 728वीं रैंक प्राप्त की है. आशा कंडारा पिछले कई बरसों से नगर निगम में अस्थाई सफाईकर्मी के तौर पर कार्यरत है. वह जोधपुर की सड़कों पर झाड़ू लगाती हैं.

कड़ी मेहनत के बल पर आशा ने सफलता हासिल की
जोधपुर की सफाईकर्मी आशा कंडारा (Sweeper Asha Kandara) ने अपने इस कार्य के साथ अनुशासनपूर्वक पढ़ाई कर राजस्थान प्रशासनिक सेवा जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा में सफल होकर यह साबित कर दिया कि वह किसी से कम नहीं. कड़ी मेहनत के बल पर आशा ने जो सफलता हासिल की है, उसने वह कहावत सच कर दिखाई है कि ‘कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता’. चाहे हालात कैसे भी क्‍यों ना हों.

Bhim Army प्रमुख एवं आजाद समाज पार्टी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष चंद्रशेखर आजाद ने भी ट्वीट कर आशा कंडारा को बधाई दी है. उन्‍होंने लिखा, बहन आशा की संघर्षों भरी जिंदगी मां सावित्रीबाई फुले जी के संघर्षों की याद दिलाती है. बहन आशा कंडारा के RAS बनने पर उन्हें हार्दिक बधाई एवं मंगलकामनाएं. हमारा समाज बहन आशा से सीखे और संकल्प लेकर गुलामी की बेड़ियां तोड़कर शिक्षा की ओर आगे बढ़े. जय सावित्री, जय भीम.

 

दिन में सफाई करतीं, वक्‍त मिलने पर पढ़ाई करतीं
दो बच्‍चों की जिम्‍मेदारी रखने वालीं आशा ने कभी पढ़ाई करना नहीं छोड़ा. वह दिन में जोधपुर की सड़कों पर सफाई का काम करतीं और वक्‍त मिलने पर पढ़ाई करतीं. अपने सपनों को पूरा करने के लिए वह मेहनत करती रहीं. आखिरकार मेहनत रंग लाई और आशा कंडारा ने आरएएस परीक्षा के तमाम तीनों चरणों प्री एग्जाम, मेन एग्जाम और इंटरव्यू में सफलता हासिल की.

निजी जिंदगी भी रही कठिन
दो बच्‍चों की मां आशा की करीब 8 साल पहले अपने पति से अनबन हो गई थी, जिसके बाद वह पति से अलग होकर खुद अपने बच्चों का पालन पोषण कर रही हैं. बुलंद हौसलों के सहारे वह नगर निगम में अस्थाई सफाईकर्मी की नौकरी करती रहीं और अपनी पढ़ाई को उन्‍होंने जारी रखा. खास बात यह भी है कि हाल ही में आशा को 12 दिन पहले ही नगर निगम में सफाईकर्मी के तौर पर स्थाई नौकरी भी मिली थी.

निगम अफसरों को देखकर जागा अधिकारी बनने का जज्‍बा
अपनी इस सफलता के लिए आशा कंडारा कहती हैं कि नगर निगम में काम करने के दौरान वह स्कूटी से जाती थीं. जहां पर ड्यूटी होती, वहां वह झाड़ू निकालकर साफ सफाई करतीं, लेकिन निगम अफसरों को देखकर उसके मन में भी अधिकारी बनने का जज्‍बा पैदा हुआ. ग्रेजुएशन के बाद उन्‍होंने आरएएस की तैयारी शुरू की. आखिरकार मेहनत रंग लाई और RAS Exam- 2018 पास कर उनका सपना पूरा हो गया.

Fist Dalit CM of India Damodaram Sanjivayya

वह शख्‍स, जो अपनी का‍बिलियत के दम पर बना देश का पहला दलित मुख्‍यमंत्री

DalitAwaaz.com पर देश के सफल दलितों (Successful Dalits) की इस श्रृंखला में हम आपको बता रहे हैं कि उन दलित (Dalit) शख्सियतों के बारे में, जिन्‍होंने समाज में सामाजिक, आर्थिक भेदभाव के बावजूद देश-दुनिया में अपनी एक पहचान बनाई. वह अपनी काबिलियत के दम पर उच्‍च पदों पर जाकर बैठे और सभी के लिए प्रेरणास्‍त्रोत बने.

इस कड़ी में आज हम आपको बताने जा रहे हैं भारत के पहले दलित मुख्‍यमंत्री (First Dalit CM of India) के बारे में…

दरअसल, हम सभी मानते हैं कि मायावती देश की पहली दलित मुख्‍यमंत्री (Dalit CM) थीं, लेकिन हम तथ्‍यात्‍मक देखें तो बसपा सुप्रीमो मायावती देश की पहली दलित महिला मुख्‍यमंत्री थीं न की दलित मुख्‍यमंत्री.

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हम आपको बताते हैं देश के पहले दलित सीएम के बारे में. ये थे दामोदरम संजीवय्या (Damodaram Sanjivayya).

दामोदरम संजीवय्या 11 जनवरी 1960 से लेकर 12 मार्च 1962 तक आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh) के मुख्यमंत्री रहे. संजीवय्या एक भारतीय राज्य के पहले दलित मुख्यमंत्री थे.

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दामोदरम संजीवय्या का जन्म 14 फरवरी 1921 को कुरनूल जिले के कल्लूर मंडल के पेद्दापडु गांव में एक माला परिवार में हुआ. जब वह छोटे थे तो उनके पिता की मृत्यु हो गई. वह म्यूनिसिपल स्कूल में एक शानदार छात्र थे और उन्होंने मद्रास लॉ कॉलेज से कानून में स्नातक की डिग्री ली. एक छात्र के रूप में भी उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया.

दामोदरम संजीवय्या समग्र मद्रास राज्य में मंत्री थे. वह 1950-52 में अनंतिम संसद के सदस्य थे. 1962 में, संजीवैया भी ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (All India Congress Committee) के अध्यक्ष बनने वाले आंध्र प्रदेश के पहले दलित नेता बने. वह 9 जून 1964 और 23 जनवरी 1966 के बीच लाल बहादुर शास्त्री के अधीन श्रम और रोजगार मंत्री थे.

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उन्होंने भारत में श्रम समस्याओं और औद्योगिक विकास पर एक पुस्तक लिखी, जोकि 1970 में ऑक्सफोर्ड और आईबीएच पब्लिशिंग कंपनी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई.

हैदराबाद के नामपल्ली में सार्वजनिक उद्यान के सामने उनकी प्रतिमा लगाई गई है. वहीं, हैदराबाद में हुसैन सागर के तट पर एक पार्क को संजीवैया पार्क के रूप में उनके सम्मान में नामित किया गया.

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दामोदरम संजीवय्या राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, देश के प्रमुख कानूनी संस्थानों में से एक विशाखापत्तनम को उनके सम्मान में नामित किया गया है.

इंडिया पोस्ट ने 14 फरवरी 2008 को उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट (INR 5.00) जारी किया.

Damodaram Sanjivayya
दामोदरम संजीवय्या 11 जनवरी 1960 से लेकर 12 मार्च 1962 तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे.

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