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मैं पूछता हूं, क्या उनकी जाति तुमसे ऊंची है? पढ़ें- ओमप्रकाश वाल्‍मीकि की कविताएं

Omprakash Valmiki Dalit Writer

नई दिल्‍ली : हिंदी में दलित साहित्‍य (Hindi Dalit Literature) के विकास में ओमप्रकाश वाल्‍मीकि (Omprakash Valmiki) की महत्‍वपूर्ण भूमिका है. अपने लेखन में जातीय अपमान और उत्‍पीड़न का जीवंत वर्णन करने वाले ओमप्रकाश वाल्‍मीकि (Omprakash Valmiki) की हर रचना देश में दलितों (Dalits) के साथ पल-पल होने वाले अत्‍याचारों पर चोट करती है. वह बताती है कि पिछड़ा समुदाय किस कदर अपने हकों से आज भी वंचित है. क्‍यों उसे कथित उच्‍च वर्ण आज भी हिकारत भरी नज़रों से देखता है. वह मानते थे कि दलित की पीड़ा को दलित (Dalits) ही बेहतर ढंग से समझ सकता है. इसलिए अपनी रचनाओं में उन्‍होंने वह सभी बातें जीवंत रूप से कही, जो भारत में दलितों के साथ आज भी सच्‍चाई है. आइये पढ़ते हैं उनकी कुछ प्रमुख रचनाएं…

ठाकुर का कुआँ / ओमप्रकाश वाल्‍मीकि (Thakur ka Kuan / Omprakash Valmiki)

चूल्‍हा मिट्टी का
मिट्टी तालाब की
तालाब ठाकुर का ।

भूख रोटी की
रोटी बाजरे की
बाजरा खेत का
खेत ठाकुर का ।

बैल ठाकुर का
हल ठाकुर का
हल की मूठ पर हथेली अपनी
फ़सल ठाकुर की ।

कुआँ ठाकुर का
पानी ठाकुर का
खेत-खलिहान ठाकुर के
गली-मुहल्‍ले ठाकुर के
फिर अपना क्‍या ?
गाँव ?
शहर ?
देश ?

(नवम्बर, 1981)

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खेत उदास हैं / ओमप्रकाश वाल्‍मीकि (Khet Udaas Hai /Omprakash Valmiki)

चिड़िया उदास है —
जंगल के खालीपन पर
बच्चे उदास हैं —
भव्य अट्टालिकाओं के
खिड़की-दरवाज़ों में कील की तरह
ठुकी चिड़िया की उदासी पर

खेत उदास हैं —
भरपूर फ़सल के बाद भी
सिर पर तसला रखे हरिया
चढ़-उतर रहा है एक-एक सीढ़ी
ऊँची उठती दीवार पर

लड़की उदास है —
कब तक छिपाकर रखेगी जन्मतिथि

किराये के हाथ
लिख रहे हैं दीवारों पर
‘उदास होना
भारतीयता के खिलाफ़ है !’

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जाति / ओमप्रकाश वाल्‍मीकि (Jaati /omprakash valmiki)
मैंने भी देखे हैं यहाँ
हर रोज़
अलग-अलग चेहरे
रंग-रूप में अलग
बोली-बानी में अलग
नहीं पहचानी जा सकती उनकी ‘जाति’
बिना पूछे
मैदान में होगा जब जलसा
आदमी से जुड़कर आदमी
जुटेगी भीड़
तब कौन बता पाएगा
भीड़ की ‘जाति’
भीड़ की जाति पूछना
वैसा ही है
जैसे नदी के बहाव को रोकना
समन्दर में जाने से!!

(2)
‘जाति’ आदिम सभ्यता का
नुकीला औज़ार है
जो सड़क चलते आदमी को
कर देता है छलनी
एक तुम हो
जो अभी तक इस ‘मादरचोद’ जाति से चिपके हो
न जाने किस हरामज़ादे ने
तुम्हारे गले में
डाल दिया है जाति का फन्दा
जो न तुम्हें जीने देता है
न हमें !

(3)
लुटेरे लूटकर जा चुके हैं
कुछ लूटने की तैयारी में हैं
मैं पूछता हूँ
क्या उनकी जाति तुमसे ऊँची है?

(4)
ऐसी ज़िन्दगी किस काम की
जो सिर्फ़ घृणा पर टिकी हो
कायरपन की हद तक
पत्थर बरसाये
कमज़ोर पडोसी की छत पर!

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