Coronavirus and Dalit

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मायावती की राज्य और केंद्र सरकार को सलाह, हवाई घोषणा नहीं स्वास्थ्य सेवाओं पर दें ध्यान

नई दिल्ली. कोरोना की दूसरी लहर (Coronavirus Second wave) में स्वास्थ्य व्यवस्था बिल्कुल पस्त हो गई है. दूसरी लहर का कहर अभी थमा भी नहीं है कि विशेषज्ञों ने तीसरी लहर की चेतावनी जारी कर दी है. बिगड़ते हालातों के बीच बसपा सुप्रीमो मायावती (BSP Mayawati) ने कहा कि केन्द्र और राज्य सरकारों से कोरोना प्रकोप को लेकर हवा हवाई घोषणाएं करने से बाज आना चाहिए और ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूती देने की दिशा में काम करना चाहिए.

मायावती ने ट्वीट किया, ‘कोरोना प्रकोप के सुविधाहीन ग्रामीण क्षेत्रों में भी काफी फैल जाने से भारत सुर्खियों में आ गया है, फिर भी सरकारें इसकी उचित तैयारी व उससे जनता को राहत दिलाने के सम्बध में ताबड़तोड़ घोषणाएं ऐसे कर रही हैं जैसे चुनाव के समय में हवा-हवाई वादों का प्रचलन है, अति-दु:खद.’

स्वास्थ्य केंद्र को तुरंत सक्रिय करने की मांग
एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा जबकि सख्त जरूरत है कि यूपी व अन्य राज्यों में पहले से ही डॉक्टर व अन्य सरकारी कर्मचारियों आदि के अभाव में खासकर जो प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र आदि बेकार व खस्ताहाल पड़े हैं उन्हें तत्काल सक्रिय किया जाए ताकि ग्रामीण भारत के अधिसंख्य गरीब व बेसहारा लोगों को इसका लाभ फौरन मिल सके.

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कोरोना वायरसः भूख से बेहाल दलितों पर पड़ी दोहरी मार

नई दिल्ली. भारत में कोरोना वायरस की दूसरी लहर से चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ है. लोगों को न तो दवाई मिल रही है, न ऑक्सीजन और न ही डॉक्टरी सहायता. महामारी के इस दौर में देश के दलित, गरीब और मजदूर वर्ग के लोगों पर दोहरा संकट आया है.

दलित ग़रीबों के सामने ख़ुद को और अपने परिवार को भूख की मार से बचाने की वो जद्दोजहद है, जिसे कोई नहीं समझना चाहता. इन लोगों के पास रहने के इंतज़ाम, जीवन की दूसरी परिस्थितियों से जूझने के अलावा सरकार की तरफ़ से जारी की गई स्वास्थ्य संबंधी हिदायतों का पालन करने की वो समस्या है, जिसको कर पाना शायद नामुमिकन है.

फिर बेबस और बेसहारा है दलित!

महामारी के दौर में गौर करने वाली बात ये है कि दलित वर्ग का एक बड़ा हिस्सा आज भी आर्थिक तौर पर इतन मजबूत नहीं है कि खुद के अलावा किसी और की समस्या सुन भी सके. ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की पलायन करने वाले ये दलित खुद को एक बार फिर बेबस और बेसहारा हैं.

आजादी के वक्त बाबा साहेब आंबेडकर ने दलितों और ग़रीबों को एक सम्मानित जीवन देने की लड़ाई लड़ी थी. उनके इस संघर्ष के परिणामस्वरूप इन वर्गों का एक भाग तो लाभान्वित हुआ है, लेकिन कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन ने बार फिर घड़ी की सुई को वहीं पर ला दिया है और दलित ‘मानवीय देह’ मात्र एक ‘बायोलॉजिकल देह’ में बदलकर रह गया है.

न तो किराया माफ हो रहा है और न ही तनख्वाह मिली

राजधानी दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाली दलित समुदाय की ललिता का कहना है कि पिछले लॉकडाउन में तो काफी कुछ था, लेकिन इस बार न तो मकान मालिक किराया माफ कर रहा है और न ही फैक्ट्री वाले तनख्वाह दे रहे हैं. जो पैसे बचे हैं उनमें घर चलाना और 3 बच्चों को पालाना मुश्किल है.

ललिता के साथ ही उसी मकान में किराए पर रहने वाले वीनित कुमार जिनकी हाल में शादी हुई है उनका कहना है कि हालात बेकार हुए हैं. अभी तो आर्थिक स्थिति जैसे-तैसे चलने वाली है. लेकिन उन्हें अगर अपने परिवार को मदद करनी पड़ जाए तो मुश्किल हो जाएगी.

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस कोरोना में जनित नई स्थिति पर मूल्यांकन कर हमें हमारे समय द्वारा निर्मित नई-नई स्थितियों के साथ अपने को समाहित करना जरूरी है, ताकि हालात सुधर सकें. अपनी कमज़ोर स्थिति के चलते ग़रीब और समाज के हाशिए पर मौजूद तबक़ा कोरोना से संक्रमित होने के सबसे बड़े जोख़िम से जूझ रहा है. इसके बावजूद उसके लिए इससे बचने की जंग सबसे कठिन है.