Mahad Andolan

Samata Sainik Dal role in struggle of Dr BR Ambedkar Mahad movement

Samata Sainik Dal: महाड़ आंदोलन के डॉ. आंबेडकर के संघर्ष में समता सैनिक दल की अहम भूमिका

Samata Sainik Dal role in struggle of Dr. BR Ambedkar’s Mahad movement : महाड़ आंदोलन (Mahad Satyagraha) से पांच दिवस पूर्व, 13 मार्च, 1927 रविवार को मुंबई में सुभेदार सवादकर की सहायता से ‘समता सैनिक दल’ (Samata Sainik Dal) की स्थापना की गई. प्रारंभ में इस दल में अधिकतर सेना से निवृत्त सैनिक थे, जिसमें आयुष्मान शंकर वडवलकर, धागांवकर हवालदार, अर्जून जातेकर, लोटेकर, सिताराम हाटें वीरकर, गोपाल आचलोलकर, कृष्णा तांबे तथा सुभेदार सवादकर इत्यादी. इसमें सुभेदार सवादकर अधिक लढाऊ तथा धूरंधर सैनिक थे. वे इन सबमें अग्रक्रम में थे.

कुलाबा जिला बहिष्कृत परिषद् (Colaba jila bahishkrit parishad) की बैठक महाड़ (Mahad) में सि.प्राना. मंडल के नाट्यगृह में 19 तथा 20 मार्च, 1927 को आयोजित की गई थी. परिषद् में 3000 से भी अधिक अछूत लोग जमा हुए थे. अधिवेशन समाप्ति के समय मा. अनंत विनायक चित्रे कहा, ‘आज इतनी महत्वपूर्ण परिषद् आयोजित की गई है, इसके द्वारा कुछ महत्वपूर्ण कार्य किए बिना हमारा अधिवेशन समाप्त नहीं होना चहिए, ऐसा मुझे लग रहा है. इस महाड़ शहर (Mahad City) में अछूतों को पीने के पानी (Drinking Water for the Untouchables) के लिए काफी मुसीबत उठानी पड़ती है. यह समस्या हल होनी चाहिए इसलिए नगरपालिका ने यहां के तालाब सभी जातियों के लिए खुले किए है ऐसा बहुत पहले जाहिर किया गया है. परंतु उस तालाब पर पानी भरने की कोशिश अछूत लोगों (Untouchables) ने अभी तक शुरू नहीं की है. यदि आज इस परिषद् द्वारा सरकारी आदेश पर अमल किया गया तो परिषद् ने एक बहुत बड़ा काम किया ऐसा कहा जाएगा. भाइयों हम सभी अध्यक्ष महोदय के साथ महाड़ के चवदार तालाब (Chavdar Tale, pond, Mahad )पर प्रवेश करके अपना अधिकार प्राप्त करेंगे.’

उसके बाद परिषद् के सभी लोगों द्वारा अध्यक्ष महोदय के साथ सभा मंडप से बाहर निकलकर एक जुलूस निकाला गया. यह जुलूस महाड़ शहर (Mahad City) की बस्तियों से होते हुए बहुत ही शांतता से तालाब पर गया.

महाड़ आंदोलन: बाबा साहब संग अछूतों का तालाब से पानी पीकर ब्राह्मणवाद को चुनौती देना

बाबा साहेब डॉ0 भीमराव आंबेडकर (Babasaheb Dr. Bhimrao Ambedkar) स्वयं तालाब के किनारे पर खडे़ रहे. जिस तालाब पर पशु-पक्षी अपनी प्यास बुझाते थे, किन्तु अछूतों को उसका पानी पीकर अपनी प्यास बुझाने के लिए अपनी पूण्यभूमि और मातृभूमि में पाबंदी थी, जिनके लिए सार्वजनिक स्थलों एवं मंदिरों में जाने के द्वार बंद थे, ऐसा वह महापुरूष हिन्दूधर्मान्धों का ढोंग भारत के खूंटी पर टांग रहा था. डॉ0 भीमराव आंबेडकर (Babasaheb Dr. Bhimrao Ambedkar) चवदार तालाब (Chavdar Tale, Pond) की सीढि़यां उतरकर नीचे गए. वह झुके तथा उन्होंने तालाब का पानी हाथ में लेकर प्राशन किया. उपस्थित जनसमुदाय ने अपने नेता का अनुकरण किया! परिषद् स्थल पर जूलुस वापस आया और परिषद् का विर्सजन हुआ.

सवर्णों को यह सब कुछ ठीक नहीं लगा और उन्होंने सत्याग्रहियों को मारा-पीटा, उनके खाने में मिट्टी मिलाई. महाड़ आंदोलन (Mahad Andolan) के समय ‘समता सैनिक दल’ (Samata Sainik Dal) स्थापित करके केवल पांच-छह दिन ही हुए थे. समता सैनिक दल के सैनिकों की संख्या भी इस समय बहुत कम थी. फिर भी इन सैनिकों ने बहादुरी दिखाते हुए इसका बदला लेने के लिए डॉ0 बाबासाहेब आंबेडकर (Dr. BR Ambedkar) से अनुमति‍ मांगी. किन्तु परिस्थिति को भांपते हुए डॉ0 बाबासाहेब आंबेडकर ने अनुमति नहीं दी और सभी को अपने-अपने गांव लौटने के लिए कहा. रोज-रोज के अन्याय अत्याचार से मुक्ति पाने के लिए अब समता सैनिक दल (Samata Sainik Dal) की आवष्यकता महसुस की जाने लगी.

इस प्रकार समता सैनिक दल की शाखाएं हर शहर तथा गांव-गांव में स्थापित की गई. डॉ0 बाबासाहेब आंबेडकर हमेशा समता सैनिक दल (Samata Sainik Dal) की देखरेख किया करते थे. सैनिकों को प्रोत्साहित करने के लिए पुरस्कार देते थे. समता सैनिक दल की संगठना का उन्हें अमर्याद विश्वास था. उनके कार्य के लिए उन्हें समता सैनिक दल अत्यंत सहाय्यकारी लगता था. उस समय पोयबावळी नाम से जाना जाने वाला मुंबई (Mumbai) का इलाका समता सैनिक दल का गढ़ समझा जाता था. इसका मुख्यालय दामोदर हॉल, परेल, पोयबावड़ी, मुंबई (Damodar Hall, Parel, Poybawdi, Mumbai) में था. समता सैनिक दल मुख्यालय के प्रमुख सुभेदार सवादकर थे.

25, 26 तथा 27 दिसम्बर, 1927 को महाड़ पुनः सत्याग्रह (Mahad Satyagrah) का आयोजन गया. मार्च, 1927 की परिषद् में हिन्दुओं द्वारा अछूतों पर किए गए अत्याचार (Atrocities on Untouchables) को ध्यान में रखते हुएं इस परिषद् की व्यवस्था के लिए मुंबई से समता सैनिक दल के पचास वॉलंटियर्स लाठी-काठीयों के साथ उपस्थित थे.

जब महाड़ सत्‍याग्रह से बाबा साहब डॉ. आंबेडकर ने दलित आंदोलन की शुरुआत की

27 दिसम्बर, 1927 को अछूतों द्वारा महाड़ शहर में जब जुलूस निकाला गया (Procession taken out by untouchables in Mahad city) था, उस समय गांव के सवर्ण नेता गांव छोड़कर भाग चुके थे. सवर्णों ने अपने घर के दरवाजे बंद कर दिए थे, हिन्दुओं के औरत-बच्चों ने ही नहीं तो पुरूषों ने भी रास्तों से धूमना बंद कर दिया था. इस समय तक समता सैनिक दल के सैनिक सवर्णों में अपनी धाक जमा चुके थे. यह परिषद् बिना किसी अड़चन के सफलतापूर्वक संपन्‍न हुई.

कालाराम मंदिर प्रवेश सत्याग्रह नाशिक (Kalaram Temple Entrance Satyagraha Nashik)
3 मार्च, 1930 को नाशिक के कालाराम मंदिर प्रवेश सत्याग्रह (Kalaram Temple Entrance Satyagraha Nashik) में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की अध्यक्षता में सैंकड़ों महिला तथा पुरूष स्वयंसेवकों ने कालाराम मंदिर के दरवाजे के सामने धरना दिया था. यह सत्याग्रह कई वर्षों तक चलता रहा. इसे दीर्घावधी तक चलाने का श्रेय समता सैनिक दल को जाता है.

नागपुर में समता सैनिक दल की स्थापना (Establishment of Samta Sainik Dal in Nagpur)
1 जनवरी, 1930 को नागपुर में समता सैनिक दल की स्थापना की गई. प्रारंभ में इसके पदाधिकारी बाबू हरदास एल. एन., रेवाराम कवाडे, विट्ठलराव सालवे, विट्ठल नगराळे, पंडुलिक भोयर, पवितपावनदास, रेवाराम कवाडे, आर. आर. पाटील, वाय. टी गायकवाड, रामटेके तथा एस. जी. मानके थे.

समता सैनिक दल के प्रतिनिधियों का कर्तव्य (Duty of representatives of Samta Sainik Dal)
शनिवार दिनांक 4 मार्च, 1933 को मुंबई के संडहर्स्ट मार्ग, वाडीबंदर के पास जी.आय.पी. रेल्वे की चाल के मैदान में आयोजित समारोह में डॉ0 बाबासाहेब अम्बेडकर ने समता सैनिक दल के सैनिकों से कहा, ‘समता सैनिक दल के वॉलंटियर्स के लिए मेरी कुछ सूचनाएं है. वॉलंटियर अर्थात हमारा ज्ञानवान तथा जाणकार पुरूष है, ऐसा मैं समझता हूं. केवल खाकी रंग के कपड़े शरीर पर परिधान कर लेने से वॉलंटियर बन जाते हैं, ऐसा मैं नहीं मानता. अपने समाज को सज्ञानी बनाना यह वॉलंटियर लोगों का मुख्य कर्तव्य है. अज्ञानी समाज को ‘जनता’ समाचारपत्र पढ़कर बताना एवं उसमें लिखी गई बातों को समझाना उनका कर्तव्य है. यह लोग अपना कर्तव्‍य निभाएंगे, ऐसी मुझे आशा है.

Mahad Andolan Dr BR Ambedkar

महाड़ आंदोलन: बाबा साहब संग अछूतों का तालाब से पानी पीकर ब्राह्मणवाद को चुनौती देना

क्या आज भी दलितों/अछूतों यहां तक की दूसरे धर्म के लोगों को सावर्जनिक नलों, जलाशयों से पानी पीने का हक़ मिल पाया है? ग़ाज़ियाबाद में एक मंदिर के नल से मुस्लिम लड़के को पानी पीने जाने पर बेरहमी से पीटे जाने की घटना के बाद फिर से इसका जवाब तलाशा जा रहा है. इस सवाल के जवाब में यह लेख और घटना आज के द‍िन के ल‍िए इसलिए भी प्रासंगिक है, क्‍योंकि आज ही के दिन (20 मार्च, 1927) करीब 94 साल पहले बाबा साहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर (Baba Saheb Dr. Bhimrao Ambedkar) ने इस कुरूति के खिलाफ एक ऐसा आंदोलन किया, जो महाआंदोलन बन गया. यह ‘महाड़ आंदोलन’ (Mahad Andolan) या महाड़ सत्याग्रह (Mahad Satyagraha) कहलाया. दरअसल, जब अछूतों को किसी भी तालाब, जलाशय से पानी पीने की अनुमति नहीं थी, बाबा साहब द्वारा महाड़ आंदोलन पानी पीने के अधिकार के साथ-साथ इंसान होने का अधिकार दिलाने के लिए भी किया गया था.

इस आंदोलन के जरिये बाबा साहब ने हजारों साल पुरानी सवर्ण सत्ता (सामंती सत्ता) को चुनौती दी थी. सवर्ण जो अछूतों को उनके इंसान भी हक देने को तैयार नहीं थी, जो जानवरों को भी प्राप्त था… उसे दिलाने को संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर आगे आए और दलितों/अछूतों को एक किया.

आज से करीब 94 साल पहले, 20 मार्च, 1927 को डॉ. आंबेडकर ने महाड़ स्‍थान पर चावदार तालाब से दो घूंट पानी पीया और हजारों वर्ष पुराने ब्राह्मणवाद के कानून को तोड़ा. यह इतिहास की एक बड़ी घटना थी. खास तौर अछूतों/दलितों के लिए उनके जीवन को बदलने की दिशा में बड़ा कदम भी था. महाड़ महाराष्ट्र राज्य के रायगढ़ जिले में आता है. आज ही के दिन डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में हजारों की संख्या में अछूत कहे जाने वाले लोगों ने सार्वजनिक तालाब चावदार से पानी पीया. डॉ. आंबेडकर ने सबसे पहले अंजुली से पानी पीया. फ‍िर उनका अनुकरण करते हुए हजारों दलितों ने पानी पीया. ऐसा कर बाबा साहब ने अगस्त 1923 में बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल (ब्रिटिशों के नेतृत्व वाली समिति) द्वारा लाए गए एक प्रस्ताव, कि वो सभी ऐसी जगहें, जिनका निर्माण और देखरेख सरकार करती है, का इस्तेमाल हर कोई कर सकता है, इसे लागू करवाया.

तालाब से पानी पीते हुए डॉ. आंबेडकर ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘क्या यहां हम इसलिए आए हैं कि हमें पीने के लिए पानी मयस्सर नहीं होता है? क्या यहां हम इसलिए आए हैं कि यहां के जायकेदार कहलाने वाले पानी के हम प्यासे हैं? नहीं! दरअसल, इंसान होने का हमारा हक जताने के लिए हम यहां आए हैं.’

अछूतों के चावदार तालाब से पानी पीने की घटना को सवर्ण हिंदुओं ने ब्राह्मणवाद सत्‍ता के खिलाफ देखा. उन्‍होंने तालाब में पानी पीने की जुर्रत का बदला दलितों से हिंसक रूप से लिया. उनकी बस्ती में आकर खूब तांडव मचाया. लोगों को लाठियों से बुरी तरह पीटा. बच्चों, बूढ़ों यहां तक की औरतों को भी पीट-पीटकर लहूलुहान कर दिया. उनके घरों में तोड़फोड़ की. सवर्ण हिन्दुओं ने इल्जाम लगाया कि अछूतों ने चावदार तालाब से पानी पीकर उसे भी अछूत, अपवित्र कर दिया है. इसके बाद सवर्णों ने ब्राह्मणों के कहने पर पूजा-पाठ और पंचगव्य यानि गाय का दूध, घी, दही, मूत व गोबर से तालाब को फिर शुद्ध किया. बाबा साहब यहीं नहीं रूके. उन्‍होंने बॉम्‍बे हाईकोर्ट में करीब 10 वर्ष तक ये लड़ाई लड़ी और अंत में 17 दिसंबर 1936 को अछूतों को चावदार तालाब में पानी पीने का अधिकार मिला. यह अस्पृश्य समाज के लिए ऐतिहासिक जीत थी.

इस तरह महाड़ आंदोलन में चावदार तालाब से बाबा साहब के साथ हजारों दलितों/अछूतों का पानी वह ऐतिहासिक पल था, जिसने अस्पृश्य वर्ग में क्रान्ति का मार्ग प्रशस्त किया. यह एक प्रतीकात्मक क्रिया थी, जिसके द्वारा यह सिद्ध किया गया कि हम भी मनुष्य हैं और हमें भी अन्य मनुष्यों के समान मानवीय अधिकार हैं.

Dalit Writer Sandeep Kumar
लेखक संदीप कुमार वरिष्‍ठ पत्रकार हैं और दलितों से जुड़े विषयों पर सक्रियता से लेखन करते हैं.