कर्नाटक

karnataka Mandya Dalit Family Boycotting

दलित परिवार को किराने का सामान नहीं, पानी सप्‍लाई तक रोकी

कर्नाटक (Karnataka) के मंड्या (Mandya) जिले की नागमंगला तहसील में एक दलित परिवार (Dalit Family) के गांव से बहिष्कृत किए जाने का मामला सामने आया है. कर्नाटक पुलिस (Karnataka Police) ने इस मामले में दस लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है.

एक रिपोर्ट के अनुसार, बीती 9 मई को बुरडकुप्पे गांव के रहने वाले बसुराजु का गांव के बाहर पानी की निकासी नाली को लेकर झगड़ा हुआ था. इसके बाद पड़ोसी उसके खिलाफ एकजुट हो गए और उन्‍होंने 12 मई को गांव में पंचायत बुलाई.

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इस पंचायत (Panchayat) में हुए फैसले के बाद बसुराजु का गांव से बहिष्कार करवा दिया गया.

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बड़ी बात यह है कि पंचायत ने यह अजीब फैसला सुनाया. इस फैसले में पंचायत ने निर्णय लिया कि दलित परिवार को गांव की किसी किराने की दुकान से सामान नहीं दिया जाएगा. साथ ही उसके साथ कोई ताल्‍लुक नहीं रखेगा.

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केवल यही नहीं, ग्राम पंचायत ने दलित परिवार के घर में पानी की आपूर्ति तक बंद कर दी.

इसको लेकर बसुराजु के नागमंगला ग्रामीण थाने में दस लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया. दलित परिवार को गांव में बहिष्कृत करने का पता चलने पर पुलिस अधीक्षक के. परशुराम व अन्य अधिकारियों ने दलित परिवार के घर जाकर किया और कार्रवाई का आश्वासन दिया.

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Karnataka Dalit Group Leader Killed

कर्नाटक : दलित संगठन के युवा नेता की घर के बाहर निर्मम हत्‍या

कर्नाटक (Karnataka) के बेलगाम (Belgaum District) जिले में गुरुवार को एक दलित (Dalit) संगठन के एक युवा नेता की हत्या कर दी गई. यह घटना गोकक शहर (Gokak City) में हुई.

द हिंदू के अनुसार, Adi Jambava Sene संगठन के एक 27 वर्षीय नेता सिद्दू अर्जुन कनमड्डी पर तीन नकाबपोश अज्ञात लोगों द्वारा उनके घर के पास कुल्‍हाड़ी और रोड से हमला कर दिया गया. उनके परिवार के सदस्य उन्हें गोकक के सरकारी अस्पताल और फिर बेलागवी ले गए, लेकिन वे नहीं बच पाए.

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पुलिस ने कहा कि कुछ निवासियों ने उन्हें बताया कि हमलावर मास्क पहने हुए थे. जांचकर्ताओं को संदेह है कि शहर में दो समूहों के बीच एक पुरानी दुश्मनी के कारण हमला हुआ. सिद्दू और उनके समर्थकों का पिछले साल एक अन्य समूह के साथ झगड़ा हुआ था. एक अधिकारी ने कहा कि यह समझौते के बाद खत्म हुआ था.

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जातिगत भेदभाव का आरोप लगाती दलित जज की अर्जी को सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराया, कहा…

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सोमवार को कर्नाटक (Karnataka) के एक दलित (Dalit) जिला जज द्वारा कथित जाति-आधारित भेदभाव के खिलाफ दायर याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा क‍ि “यह 11वें घंटे में दायर की गई थी”.

दलित न्यायाधीश (Dalit judge), आर के जी एमएम महास्वामीजी (RKGMM Mahaswamiji) ने कर्नाटक हाईकोर्ट (Karnataka High Court) कॉलेजियम के उस निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें उसकी सीनियरिटी को नज़रअंदाज कर उनके जूनियर को प्रमोट किया गया था.

नेशनल हेराल्‍ड के अनुसार, अपनी याचिका में शिवमोग्गा के प्रधान जिला न्यायाधीश महास्वामीजी ने कर्नाटक हाईकोर्ट कॉलेजियम ने उनकी वरिष्‍ठता की अनदेखी कर कर्नाटक उच्च न्यायालय के लिए “जूनियर डिस्ट्रिक्ट जज” पद्मराज एन देसाई की सिफारिश की.

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मीडिया रिपोटर्स के मुताबिक, नियुक्ति को चुनौती देते हुए जस्टिस देसाई के शपथ लेने से करीब आधे घंटे पहले दलित जज ने सुप्रीम कोर्ट से संपर्क किया.

महास्वामी जी ने अपनी याचिका में तर्क दिया देते हुए कहा कि कॉलेजियम की सिफारिश “वैधानिक नियमों / प्रशासनिक निर्देशों के स्पष्ट उल्लंघन में” थी. “यह वरिष्ठ जिला न्यायाधीश (जो आरक्षित श्रेणी (यानी, अनुसूचित जाति) के तहत 25.02.2008 को नियुक्त किया गया था) के कनिष्ठ जिला न्यायाधीश द्वारा सुपरसीडिंग/पासिंग का मामला है… सिफारिश में पूर्वाग्रह और बदनीयत थी. और अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और 16 (सार्वजनिक रोजगार के मामलों में समानता) के तहत याचिकाकर्ता के गारंटीकृत कार्यात्मक अधिकारों का स्पष्ट रूप से उल्लंघन करती है.

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याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता और अनिरुद्ध बोस की खंडपीठ ने यह कहते हुए किसी भी निर्देश को पारित करने से मना कर दिया कि याचिकाकर्ता ने “ग्यारहवें घंटे” में अदालत का दरवाजा खटखटाया.

यहां यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि जुलाई 2019 में उच्च न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा न्यायमूर्ति देसाई के नाम को मंजूरी दे दी गई थी और इस वर्ष की शुरुआत में उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा अनुमोदित किया गया था. केंद्रीय कानून मंत्रालय ने 30 अप्रैल को शपथ ग्रहण के लिए अधिसूचना जारी की थी.

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Supreme Court of India
सुप्रीम कोर्ट का फाइल फोटो…

विशेषज्ञों के अनुसार, हाईकोर्ट कॉलेजियम में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों के साथ-साथ राज्य सरकार के साथ विचार-विमर्श के बाद नामों की सिफारिश करती है.

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