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BSP Chief Mayawati said only Dalit will be my successor

बसपा सुप्रीमो बहन मायावती की बड़ी घोषणा- ‘मेरा उत्‍तराधिकारी केवल दलित होगा’

नई दिल्‍ली/लखनऊ : बहुजन समाज पार्टी (BSP) सुप्रीमो और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री बहन मायावती (BSP Chief Mayawati) ने आगामी उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 (UP Assembly Election 2022) से पहले अपने उत्ताराधिकारी (Successor) को लेकर बड़ा बयान जारी किया है. उन्होंने अपने खराब स्‍वास्‍थ्‍य की अटकलों के बीच यह बयान दिया और यह स्‍पष्‍ट किया कि उनका उत्‍तराधिकारी केवल दलित (Dalit) ही होगा.

BSP Chief Mayawati ने कहा कि ‘मेरा स्‍वास्‍थ्‍य अभी ठीक है. मुझे अभी किसी को अपना उत्तराधिकारी बनाने की ज़रुरत नहीं. जब स्वास्थ्य सही नहीं रहेगा तब ज़रूर बनाऊंगी. साथ ही उन्होंने कहा कि मेरा उत्तराधिकारी केवल दलित (Dalit) ही होगा’.

Mayawati Why this UP election 2022 more important

मायावती के लिए यह यूपी चुनाव पहले से कहीं ज्‍यादा अहम क्‍यों है?

उत्‍तर प्रदेश में पिछले कई विधानसभा चुनावों से इतर इस बार प्रदेश में जातीय समीकरणों को साधने की एक अलग ही तस्‍वीर नजर आ रही है. खासकर बीएसपी. BSP सुप्रीमो मायावती (Mayawati) दलित (Dalits) के साथ-साथ ब्राह्मण वोटरों (Brahmin Voters) को भी अपनी ओर खींचने के ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के फॉर्मूले पर सक्रियता से काम कर रही हैं. इसके जरिये मायावती ने 2007 के विधानसभा चुनाव में मिली जीत के अपने फॉर्मूले को यूपी चुनाव 2022 (UP Chunav 2022) में एक बार फिर आजमाने की ठानी है.

दरअसल, साल 2007 में बहुजन समाज पार्टी (Bahujan Samaj Party) दलित+ब्राह्मण सोशल इंजीनियरिंग का सफल प्रयोग कर चुकी है. तब इस सोशल इंजीनियरिंग के आर्किटेक्ट थे मायावती के विश्वासपात्र सतीश चंद्र मिश्रा.

लेकिन बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती (Mayawati) के लिए ये विधानसभा चुनाव पहले से कहीं ज्यादा अहम है. मायावती (Mayawati) अपने दलित वोटों के सहारे सत्ता पर काबिज होती रही हैं, लेकिन हाल के दिनों में बहुजन समाज पार्टी से दलितों के साथ पिछड़े वर्ग के बड़े चेहरे अलग होते जा रहे हैं. इन लोगों को या तो बसपा ने खुद पार्टी से निकाल दिया या फिर धीरे-धीरे लोगों ने ही किनारा कर लिया.

अब जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं बसपा भी कोर वोटरों से अलग दूसरे वोटों को भी साधने की कोशिश कर रही है. हालांकि यह बात तय है कि बसपा को बेहतर प्रदर्शन करने के लिए पिछड़े वोटरों के मोर्चे पर अपनी मजबूत तैयारी करनी होगी.

हालांकि मौजूदा समय में हालात यह हैं कि बसपा में पिछड़े और दलित नेताओं का पार्टी से छिटकना लगातार जारी है. हाल के दिनों में दलितों और पिछड़ों के लिए बड़े नेता माने जाने वाले लोगों में आर के पटेल, सोनेलाल पटेल, एसपी बघेल, डॉक्टर मसूद अहमद, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, अब्दुल मन्नान, नरेंद्र कश्यप, आर के चौधरी, इंद्रजीत सरोज, जुगल किशोर, जंग बहादुर पटेल और राम लखन वर्मा जैसे बड़े नेताओं ने पार्टी से किनारा किया है. राजनीतिक जानकार कहते हैं, इसका प्रभाव पार्टी पर जरूर पड़ेगा.

लिहाजा, पार्टी इस बार भी ब्राह्मण वोटरों को लुभाने की ओर ज्‍यादा ध्‍यान दे रही है. इस बार भी पार्टी के नेता सतीश चंद्र मिश्र ने यह अभियान शुरू किया है. जिसमें पारंपरिक वोटों के अलग उन्होंने ब्राह्मणों को लुभाने के लिए सम्मेलनों का आयोजन शुरू किया है. राजनीतिक पंडितों का कहना है कि बसपा के इस कदमा से साफ पता चलता है बसपा को लगता है कि उसका कोर वॉटर उससे खिसक रहा है, इसीलिए वोटरों की नई बिसात बिछाने के लिए ब्राह्मणों और दूसरी जातियों की तरफ बसपा ने रुख किया है.

अगर 2007 की बात करें तो राजनीतिक पंडितों को शुरुआत में बसपा का यह सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला कामयाब होता नहीं दिखा था, लेकिन लेकिन जब चुनाव के नतीजे आए तो सब चौंकने को मजबूर हुए. बसपा ने 403 में से 206 सीटें जीतकर पूर्व बहुमत की सरकार बनाई और मायावती मुख्यमंत्री बनी थीं.

दरअसल, उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी 12-13 फीसदी के बीच है. कुछ विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां ब्राह्मणों की आबादी 20 प्रतिशत के आसपास है. यहां ब्राह्मण मतदाताओं का रुझान उम्मीदवार की जीत और हार तय करता है. बसपा और सपा की नजर ऐसे ही ब्राह्मण बाहुल्य विधानसभा सीटों पर है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर, हाथरस, अलीगढ़, मेरठ के अलावा ज्यादातर ऐसे जिले पूर्वांचल और लखनऊ के आस-पास के हैं, जहां ब्राह्मण मतदाता उम्मीदवार की हार और जीत तय करने की स्थिति में हैं. ऐसे में बसपा दलित वोटरों के साथ ही ब्राह्मण वोटों को फ‍िर साधकर सत्‍ता में आने की पूरी कोशिश में लगी है. लिहाजा पार्टी और सुप्रीमो मायावती (Mayawati) के लिए यह चुनाव पिछली बार से भी ज्‍यादा अहम है. अब देखना यह है कि इस बार पार्टी का कोर वोटर और नया वोटर किस ओर जाकर बैठता है.

Dalchand Dalit Awaaz Author

(इस आर्टिकल के लेखक डालचंद दिल्‍ली की आईपी यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं.)

UP Assembly Election 2022 BSP National Coordinator Akash Anand holds meeting with Youth cadre

BSP मूवमेंट को आगे बढ़ाने की कवायद में आकाश आनंद, युवाओं से किया संवाद

नई दिल्‍ली/लखनऊ : उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 (UP Assembly Elections 2022) के मद्देनजर बहुजन समाज पार्टी (BSP) अपने पुराने काडर के साथ-साथ नए काडर को जोड़ने की ओर विशेष ध्‍यान दे रही है. पार्टी का खास रुझान युवाओं की ओर भी है, ऐसे में बसपा के राष्ट्रीय समन्वयक आकाश आनंद (Akash Anand) ने युवाओं के साथ अहम बैठक की है.

उत्‍तर प्रदेश चुनावों के लिए बसपा के मिशन में लगे आकाश आनंद (BSP National Coordinator Akash Anand) ने यह जानकारी ट्वीटर पर साझा की. उन्‍होंने लिखा, बीएसपी (BSP) के कुछ समर्पित युवा साथियों के साथ भविष्य की योजनाओं को लेकर बातचीत हुई. मंहगाई, रोजगार, समानता और सुरक्षा के मुद्दे पर पूरे देश में युवा साथियों के साथ संवाद की एक शुरुआत हुई है.

 

साथ ही उन्‍होंने कहा कि मान्यवर कांशीराम जी (Kanshi Ram) के विचार और आदरणीय मायावती जी (Mayawati) के शासन की उपलब्धियां जन जन तक पहुंचाना है.

Dalits and Brahmins together defeat BJP BSP GS Satish Mishra

दलित और ब्राह्मण मिलकर भाजपा को उखाड़ फेंके : बसपा महासचिव सतीश मिश्रा

कौशांबी : बहुजन समाज पार्टी (BSP) के महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा (Satish Chandra Mishra) ने मंगलवार को कहा कि अब समय आ गया है जब प्रदेश के 13 प्रतिशत ब्राह्मण (Brahmin) और 23 प्रतिशत दलित समाज (Dalits) मिलकर प्रदेश में होने वाले आगामी उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 (UP Assembly Election 2022) में भाजपा (BJP) को उखाड़ फेंके.

उन्होंने कहा कि प्रदेश की भाजपा (BJP) सरकार के समय ब्राह्मण- दलित उत्पीड़न (Dalit Atrocities) किसी से छिपा नहीं है. पिछले वर्ष हाथरस में दलित बालिका के साथ बलात्कार के बाद उसे उसका शव परिजनों को न सौंप कर रात्रि में जला दिया गया. इस घटना से हम सबका सिर पूरे विश्व में शर्म से झुक गया. प्रदेश में ब्राह्मण एवं दलितों (Dalits) को भाजपा अब डराना धमकाना भूल जाए.

मंगलवार को यहां बसपा कार्यालय में आयोजित बैठक में राज्यसभा सांसद मिश्रा ने कहा कि बसपा (BSP) के शासनकाल में बतौर मुख्यमंत्री मायावती (Mayawati) ने भारी संख्या में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां ब्राह्मणों को देकर उनके सम्मान को बढ़ाया था. वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में 80 ब्राह्मणों को चुनाव मैदान में उतारा गया था, जिनमें से 45 ब्राह्मण चुनकर आए थे. कई ब्राह्मणों को कैबिनेट मंत्री बनाया गया था. वर्तमान में भाजपा के शासनकाल में विधायक बेहद दुखी हैं, मंत्रियों तक की बात नहीं सुनी जा रही है.

उन्होंने कहा कि सरकार महंगाई रोकने में विफल है, तेल घी सहित जरूरत के समान महंगे हो गए हैं. मिश्रा ने दावा किया कि भाजपा ने राम के साथ भी धोखा किया है, मंदिर के चंदे से भाजपा आगामी चुनाव की तैयारी कर रही है. उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘मंदिर के चंदे से भाजपा ने 500 चुनावी रथ तैयार किए हैं. मंदिर की अभी नींव भी नहीं बनी है, मंदिर कब बनेगा भाजपा इस की तारीख भी नहीं बता पा रही है.’’

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