Balwinder Kaur Nandani

इसलिए बाबा साहब को था किताबों से प्यार, पढ़ें पूरी कहानी…

Balwinder Kaur Nandini
बलविंदर कौर ‘नंदनी’

शिक्षा का स्थान बाबा साहब डॉ. बी आर आंबेडकर के जीवन और उनके विचारों में सबसे अधिक महत्व रखता है, लेकिन बाबा साहब जिंदगी पर नजर डालें तो उनके लिए ज्ञान का स्रोत सिर्फ स्कूली और कॉलेज की शिक्षा नहीं थी, बल्कि वह सबकुछ जान लेना चाहते थे.

सबकुछ जान लेने की इसी जुनून ने उन्हें एक ऐसा पुस्तक प्रेमी बना दिया, जिसकी मिसाल कम ही मिलती है. उनके जीवन पर नजर डालें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि किताबों से उनका प्रेम समय के साथ बढ़ता ही गया.

उनके अध्ययन का क्षेत्र बड़ा व्यापक था. वह किसी एक विषय के ज्ञाता बनकर बैठ जाने वाले व्यक्ति नहीं थे. कानून, धर्म, इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र जैसे कई विषयों की किताबें वह पढ़ा करते थे.

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बाबा साहब को सिर्फ उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपना शानदार करियर ही नहीं बनाना था, बल्कि उन्हें तो करोड़ों दलित, उपेक्षित और शोषित लोगों की मुक्ति का राह खोजनी थी. यह काम सिर्फ पाठ्यक्रम की पुस्तकों से नहीं हो सकता था. इसलिए स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई पूरे मन से करने के बाद भी बाबा साहब के मन में पाठ्यक्रम की बाहर की किताबों के प्रति लगाव बढ़ता रहा. यह किताबें ही थीं जो उन्हें सवाल करना सीखा रही थीं और आने वाले दिनों में संघर्ष के लिए मजबूत वैचारिक आधार प्रदान कर रही थीं.

शुरुआती स्कूली शिक्षा के दौरान बालक भीम का ध्यान पढ़ने लिखने की ओर अधिक नहीं था. जब भीम के पिता की सतारा में नौकरी का समय पूरा हो गया तो परिवार मुंबई आ गया. परिवार लोअर परेल की डबक चाल में रहने लगा. यहां बाबा साहब का दाखिला ‘मराठा माध्यमिक स्कूल’ में करा दिया गया.

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भीम के पिता रामजी उनकी पढ़ाई के लिए बहुत चिंतित रहते थे. धनंजय कीर ‘डॉ बाबासाहब आंबेडकर जीवन चरित’ में लिखते हैं, ‘वह (भीम) सूबेदार को अपने जीवन की एकमात्र आशा की किरण लगता था. वह उनकी आशा का आश्रय और अभिमान का तारा था. भीम को परीक्षा में प्राप्त साधारण सफलता से उनके मन को संतोष नहीं होता था. रात दिन उन्हें उसके उत्कर्ष की छटपटाहट लगी रहती थी, उस झटपटाहट का अर्थ भीम बिल्कुल नहीं समझता था.’ (पृष्ठ 20)

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‘उस सब छटपटाहट का असर भीम के जीवन पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ता था. उसके मन में पाठ्यक्रम के बाहर की किताबें पढ़ने इच्छा हुई. किताबों के प्रति उसके मन में दिलचस्पी बढ़ने लगी. उसके लिए वह जिद करने लगा. महत्वपूर्ण ग्रंथ देखने पर उसे ऐसा लगता था कि वह अपने संग्रह में हो. अध्ययन की ओर ध्यान न देकर बेटा अतिरिक्त किताबें पढ़ें… यह बात रामजी को बिल्कुल पसंद नहीं थी तथापि बच्चे के हठ करने पर जेब में पैसा हो या न हो…वे किताब लाने के लिए निकल पड़ते थे.’ (पृष्ठ 20)

कीर बताते हैं, भीम के पिता रामजी को कई बार भीम की किताब खरदीने के लिए अपनी बेटी से उधार लेना पड़ता, जिसकी शादी हो चुकी थी. हालांकि भीम को अब किताबों की लत लग चुकी थी. कीर लिखते हैं, ‘पिताजी द्वारा लाए ग्रंथ पढ़ते-पढ़ते सिरहाने रखकर भीम सो जाता था, मानों भीम की ऐसी आदत ही बन गई थी. ‘ (पृष्ठ 21)

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आगे चलकर जब बाबा साहब पढ़ाई करने के लिए अमेरिका गए तो वहां भी किताबों के प्रति उनकी दीवानगी जारी रही, बल्कि कुछ बढ़ ही गई. धनंजय कीर द्वारा लिखी बाबा साहब की जीवनी के मुताबिक, ‘ग्रंथ खरीदने की अंबेडकर की भूख कम होने के बदले बढ़ती ही जा रही थी. समय मिलने पर वे पुराने ग्रंथों की दुकानों में भटकते रहते थे. पेट काटकर ग्रंथ खरीदने की धुन से लगभग दो हजार पुराने ग्रंथों का संग्रह उनके पास हो गया.’

बाबा साहब का जीवन हमें यह संदेश देता है कि जीवन के लिए ज्ञान का महत्व सबसे अधिक है और किताबें ज्ञान का सबसे बड़ा स्रोत. किताबें मानव की सच्ची दोस्त हैं यही शिक्षा हमें बाबा साहब के जीवन से मिलती है.

लेखक बलविंदर कौर नन्दनी दलित साहित्य पर शोधकर्ता (दिल्ली विश्वविद्यालय) व स्वतंत्र पत्रकार हैं…

Dr. BR Ambedkar

बाबा साहब को कैसे मिला था ‘आंबेडकर’ सरनेम, जानें पूरा इतिहास

 

Balwinder Kaur Nandini
बलविंदर कौर ‘नंदनी’

पूरी दुनिया बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर (Dr. BR Ambedkar) को भारत के संविधान निर्माता के रूप में जानती है. आधुनिक भारत की नींव रखने वालों में से एक बाबा साहब के जीवन और समय को जानने की दिलचस्पी हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ी है, लेकिन अभी बहुत सी बातें हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोगों को पता है. ऐसी ही एक कहानी उनके सरनेम को लेकर भी है, जिसके बारे में ज्यादा लोगों को नहीं पता है. यह कहानी बहुत ही दिलचस्प है.

‘जन्म नाम था भीम, लेकिन स्कूल में लिखवाया गया भीवा’
धनंजय कीर की लिखी जीवनी को बाबासाहब पर लिखी सबसे प्रमाणिक और मशहूर जीवनी के तौर पर माना जाता है. इस जीवनी के मुताबिक बाबा साहब का जन्म नाम भीम था, लेकिन उनको घर में भीवा भी बुलाते थे और आगे के जीवन में विश्वविद्यालयी शिक्षा समाप्त होने तक भीवराव ही नाम रह गया. (डॉ. बाबासाहब आंबेडकर जीवन चरित, पापुलर प्रकाशन, पृष्ठ 11)

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सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका गेल ओमवेट द्वारा लिखी बाबा साहब की जीवनी ‘अंबेडकर प्रबुद्ध भारत की ओर’ में लिखा है, ‘भीम चोहदवां बालक (अपने माता-पिता का) था, जिसे भीवा भी पुकारा जाता था’ (पृष्ठ 3).

इसी जीवनी में वह आगे लिखती हैं, ‘बाबा साहब का परिवार 1894 में सतारा आकर रहने लगा था, जहां उनके पिता राम जी को लोक निर्माण विभाग में स्टोरकीपर के पद पर नियुक्त  किया गया. वहीं उनके सबसे छोटे बेटे (बाबा साहब) ने एक कैंप स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा शुरु की और वर्ष 1900 में अंग्रेजी माध्यम के एक सरकारी हाई स्कूल में पहली कक्षा में दाखिला पाया. इस स्कूल में उनका भीवा राव अंबेडकर के रूप में दाखिला हुआ. उनके नाम करण के पीछे भी एक कहानी है.’ (पृष्ठ-5)

‘बाबा साहब के पिता ने नहीं लगाया जाति दर्शाने वाला सरनेम’
दरअसल डॉ. आंबेडकर के परिवार का नाम सकपाल था. पिता रामजी मालोजी सकपाल निम्न जाति दर्शाने वाले इस उपनाम का इस्तेमाल नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने यह तय किया कि वह अपने उपनाम के तौर पर अपने गांव के नाम का इस्तेमाल करेंगे.

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गेल ओमवट की किताब में इस किस्से का जिक्र करते हुए कहा गया है, ‘महाराष्ट्र में यह एक आम  प्रथा है जहां ‘कर’ से समाप्त होने वाले सभी नाम स्थान सूचक होते हैं. उनके गांव का नाम अंबावाडे था और इस प्रकार उनका नाम अंबावाडेकर होना चाहिए था.’

ब्राह्मण शिक्षक, जिसकी वजह से मिला बाबा साहब को उपनाम अंबेडकर 
गेल ओमवेट की किताब के मुताबिक कैंप स्कूल में बाबा साहब का एक शिक्षक अंबेडकर था और तेज बालक भीवा उसका प्रिया शिष्य था. यह शिक्षक भीवा को रोज भोजन कराता था ताकि उसे दोपहर के भोजन के लिए दूर अपने घर आना-जाना न पड़े. किताब के अनुसार उसी शिक्षक के सम्मान में बालक का नाम अंबेडकर पड़ गया.

गेल ओमवेट लिखती हैं, ‘बाद के वर्षों में जब अंबेडकर गोलमेज सम्मेलन के शिष्टमंडल के सदस्य बनाए गए, उस मौके पर उक्त शिक्षक महोदय ने अंबेडकर को एक भावपूर्ण पत्र लिखा. 1927 में जब अंबेडकर की उस शिक्षक से भेंट हुई तो उन्हें गुरू के रूप में सम्मानित किया.’ (पृष्ठ 4)

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वहीं धनंजय कीर की किताब में इस किस्से का जिक्र थोड़े अलग ढंग से आया है. वह लिखते हैं, ‘आंबेडकर गुरुजी ने भीम के लिए और एक संस्मरणीय कार्य किया भीम का कुलनाम अंबावेडकर था उन्हें ऐसा लगा यह कुल नाम ठीक नहीं अतः एक दिन आंबेडकर गुरुजी ने भीम से कहा कि वह सरल सुलभ आंबेडकर नाम धारण करे. तुरंत ही स्कूल के कागजात में उन्होंने वे नाम दर्ज कर लिया.’ (पृष्ठ -18)

कीर भी अपनी किताब में गुरु-शिष्य के बीच प्रेमपूर्ण संबंधों का जिक्र करते हैं. वह भी गोलमेज सम्मेलन के दौरान गुरु के द्वारा अपने शिष्य को लिखे गए पत्र के बारे में भी बताते हैं. कीर बाबा साहब की अपने गुरू के साथ मुंबई में हुई एक मुलाकात का भी जिक्र करते हैं जहां बाबासाहब ने अपने गुरू को पोशाक देकर सम्मानित किया था. (पृष्ठ 18)

बाबा साहेब के इन गुरुजी का नाम दोनों ही जीवनीकारों ने नहीं दिया. वीकिपीडिया के मुताबिक इस शिक्षक का नाम कृष्णा केशव अंबेडकर था. वीकिपीडिया में इस तथ्य के संदर्भ के तौर पर दिव्य मराठी की एक रिपोर्ट का जिक्र है. जिसके मुताबिक कृष्णा केशव अंबेडकर की परिवार ने आज भी गुरु-शिष्य के यादों को सहेज कर रखा है.

कॉलेज में जाकर भीवा से भीम राम आंबेडकर बन गए बाबा साहब
बाबा साहब का भीवा नाम उनके साथ हाई स्कूल तक चला. हाई स्कूल पास करने के बाद उन्होंने बंबई के एलफिंस्टन कॉलेज में दाखिला ले लिया. गेल ओमवेट की किताब के मुताबिक, ‘वहां सन 1913 में अंग्रेजी और फारसी में बीए की परीक्षा उत्तीर्ण की’. आगे वह लिखती हैं, ‘इसी दौरान बचपन से चला आ रहा उनका नाम बदल गया और कॉलेज की वार्षिक परीक्षा में उनका भीम नाम दर्ज किया गया.’

लेखक बलविंदर कौर नन्दनी दलित साहित्य पर शोधकर्ता (दिल्ली विश्वविद्यालय) व स्वतंत्र पत्रकार हैं…

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दलित मुक्ति के सवालों की तलाश और अंतरजातीय विवाह

अंग्रेजों से स्वतंत्रता पाने के लिए ‘आज़ादी’ एक विचार था और उस विचार पर कई सारे दृष्टिकोण एक साथ काम कर रहे थे. यदि हम बैठकर उन विचारों का अध्ययन करें तो देखते हैं कि कहीं न कहीं आज़ादी के कारणों में वह सब सम्मिलित हैं. दलित समाज (Dalit Samaj) हजारों वर्षों से गुलामी की दलदल में धसा पड़ा है. इसे इस दलदल से बाहर निकालने की कोशिश संयुक्त रूप में कभी नहीं की गई.

दलितों के लिए मध्यकालीन सन्तों, गुरुओं जैसे कबीर, गुरु नानक देव, रविदास आदि ने शब्द युद्ध लड़ा. समाज में फैली बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई, लेकिन यह लड़ाई प्रतीकात्मक बनी रही. सही मायनों में दलितों की ‘राजनैतिक चेतना’ ने ही दलित विषय की गम्भीरता को समझा, लेकिन दलितों के पास सच्चे नेता की कमी लम्बे समय से बनी हुई है.

दलित समाज में वर्तमान समय में सही नेतृत्व की कमी है. नए विचारों की कमी है. केवल जागरूकता के नाम पर साहित्यिक सेमिनारों का आयोजन पर्याप्त नहीं है. दलितों को संगठित होने की बात बाबा साहब डॉ. बीआर आंबेडकर कह गए हैं, क्योंकि दलितों का एकजुट होना ही इनकी जीत है. मौका परस्तों को, दलित नेतृत्व में आगे ना आने देना आज सबसे बड़ी जरूरत है.

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आज की लड़ाई जीतने के लिए दलितों को एक नए औज़ार की जरूरत है. एक ऐसे विचार की जरूरत है जो एक नया और ताकतवर हथियार खड़ा कर सके. जो दलितों को इस गुलाम मानसिकता से बाहर निकाल सकने में कामयाब हो सके.

एडवोकेट एस. एल विरदी, डॉ आंबेडकर (Dr. BR Ambedkar) के बताए रास्तों को दलित मुक्ति का रास्ता बताते है. अपने एक लेख में बाबा साहब की कही बातों को आसान शब्दों में समझाते हुए लिखतें हैं:

1. समाज में सभी व्यक्तियों को शिक्षा प्राप्ति और अपनी रुचि अनुसार रोजगार चुनने की आज़ादी होनी चाहिए.
2. समाज में तरक्की के लिए सभी के लिए समान अवसर और साधन उपलब्ध होने चाहिए.
3. समाज में यदि कोई व्यक्ति मुकाबले की दौड़ में किसी कारण से पीछे रह जाता है तो भी वह खुद से आगे निकलने वालों की घृणा का पात्र नहीं बनना चाहिए, बल्कि उसके साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार होना चाहिए.
4. समाज में किसी भी व्यक्ति को रोजगार परिवर्तन की आजादी होनी चाहिए. पैतृक कार्य के लिए वह बाध्य ना किया जाए.
5. समाजिक या धार्मिक आधार पर किसी के साथ भी भेदभाव नहीं होना चाहिए.
6. समाज में विवाह के लिए जन्म, जात, वर्ण की पाबंदी नहीं होनी चाहिए.

इन सभी बातों में सबसे महत्वपूर्ण जो आख़री नुक़्ता है, वह ही दलित मुक्ति का सबसे अहम उत्तर बन सकता है. अफसोस के आज देश डिजिटल होने की बात करता है, मगर हजारों वर्षों से चली आ रहे जातीय समीकरणों को बदलने के लिए झिझकता दिखाई देता है. पढ़-लिखकर नौकरी कर रहे बच्चों के दिमाग में जातिवाद का ज़हर धीरे-धीरे इंजेक्ट किया जाता है. यह बेहद दुखद है, पर सत्य है. समाजिक नियमों को बदलने का हमारे यहां अधिक चलन नहीं रहा है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जैसे एक जगह अधिक देर तक खड़े पानी में बदबू आने लगती है, बिल्कुल उसी तरह कुप्रथाएं भी वातावरण को दूषित करती हैं. उनका बदलाव ही जीवन की नियति है.

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जहां इस विषय को लेकर निराशा होती है, वहीं सकारात्मक व सही सोच वाले समझदार लोग भी समाज के हर वर्ग में पाए जाते हैं. उनसे प्रेरणा पाकर ही जातिवाद में समय- समय पर सेंध लगती रही है. अनेक युवा माता-पिता के खिलाफ जाकर भी विवाह करते हैं, जहां कई बार बाद में आशीर्वाद दे दिया जाता है और कई बार ऑनर किलिंग की सूली चढ़ा दिया जाता है.

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सही मायनों में समाजिक धारणाओं को बदलने के लिए पढ़े-लिखे युवाओं का संगठित होना और विवाह की नवीन पंरपरा आरंभ करना ही दलित मुक्ति का सफल क़दम होगा.

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लेखक बलविंदर कौर नन्दनी दलित साहित्य पर शोधकर्ता (दिल्ली विश्वविद्यालय) व स्वतंत्र पत्रकार हैं…

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं.)

 

Indian-Caste-System-and-Dalits

भारतीय जातीय व्यवस्था और दलित: पहचान का सवाल

ब्‍लॉग- बलविंदर कौर नन्दनी

भारतीय समाज के भीतर इतिहास द्वारा जात-पात की एक ऐसी व्‍यवस्‍था को खड़ा किया गया है, जिसमें मनुष्य अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक उलझा हुआ है. मनुष्य के जन्म के साथ उसकी जातीय पहचान तय हो जाती है, जो मृत्यु तक उसके साथ-साथ चलती है. 21वीं सदी के इस वैज्ञानिक युग में रहते हुए भी आज समाज पूरी तरह से वर्ण व्यवस्था से मुक्ति नहीं पा सका है. अख़बारों की सुर्खियां समाज के इस सच को बयान करती रहती हैं, जिससे हम सभी भलीभांति परिचित हैं. बड़े ही आश्चर्य की बात है कि जातपात की हजारों वर्ष पहले बनी कुप्रथाओं को समाज आज भी ज्यों का त्यों निभाता आ रहा है. आखिर इसका कारण क्या है?

क्या मनु द्वारा बनाया जाति आधारित फलसफा इस पर काम कर रहा है या इसके पीछे कारण कुछ और ही है? दलितों का आगमन इतिहास में कब और कैसे हुआ? इसके बारे में बाबा साहब आंबेडकर स्पष्ट करते हुए लिखतें हैं, ”छुआछूत 400 ई. के आसपास किसी समय पैदा हुई और बौद्ध धर्म व ब्राह्मण धर्म के संघर्ष में से पैदा हुई है. इस संघर्ष ने भारत के इतिहास को पूरी तरह से बदल दिया है.”

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दलित विद्वानों के अनुसार वैदिक समय (रामायण काल) तक आते-आते जातीय प्रथा ने समाज में अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी. जातीय विभाजन के उदाहरण रामायण की कथाओं में देखे जा सकते हैं. ‘शंबूक’ नाम का पात्र इसका मुख्य उदाहरण है, जिसे केवल इसलिए मृत्युदंड दिया गया, क्योंकि नीची जाति होने के बावजूद वह मुक्ति के लिए तप कर रहा था. ऐसे तथ्य ये सिद्ध करते हैं कि शूद्रों को मुक्ति के लिए सोचने का भी अधिकार प्राप्त नहीं था.

उस समय दलितों को शास्त्र और शस्त्र विद्या सीखने का भी कोई अधिकार हासिल न था. रामायण की तरह महाभारत काल में ऐसी अन्यायपूर्ण घटनाओं का जिक्र मिलता है. ‘एकलव्य’ के अंगूठे की बलि इतिहास में केवल इसलिए ली गई, क्योंकि वह नीची जाति में होते हुए भी अर्जुन से बेहतर धर्नुधर था. इस प्रकार पुराने धर्मग्रंथों और शास्त्रों में शूद्रों को नीचा समझे जाने के प्रमाण मौजूद हैं.

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चतुवर्णीय जाति व्यवस्था द्वारा पूरे समाज को चार वर्णों में बांटा गया है, ब्राहम्ण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र. शूद्रों का काम केवल बाकी के तीन वर्गों की सेवा करना बताया गया है. शूद्रों के भी आगे चलकर दो वर्ण बन गए. एक शूद्र वह जिनके हाथ का पानी पीया जा सकता था. दूसरे अछूत शूद्र, उनके हाथ का पानी ग्रहण करना वर्जित था. ये वर्जित समाज ही आज दलित कहलाते हैं.

वास्तव में दलित पहचान का मसला उनके शोषण की स्थिति से जुड़ा हुआ है, जिन्हें समझने के लिए एतिहासिक घटनाओं का अध्ययन करना जरूरी है. मनुस्मृति के अनुसार शूद्रों को मनुष्य मानने से भी इनकार किया है. समाज में जीवित रहने के लिए उनके पास कोई अधिकार नहीं था. मनुस्मृति में दर्ज बातों का उल्लेख करते हुए दलित चिंतक डॉ. मनमोहन अपने एक लेख ‘दलित चेतना और भारतीय मिथ/पौराण’ में मनु स्मृति के कुछ उदाहरण पेश करते हैं. उसके कुछ अंश इस प्रकार है-

# यदि कोई शूद्र ब्राह्मण को धर्म उपदेश देने की गुस्ताखी करे तो राजा को खौलता हुआ तेल उसके कानों और मुंह पर उढ़ेल देना चाहिए.
# राजा को चाहिए कि यदि उसे दबा हुआ धन मिले तो उसमें से आधा धन ब्राह्मण देवता के खजाने में जमा कर देना चाहिए.

वास्तव में मनु द्वारा बनाए गए यह नियम आर्यों के भारत आने के बाद की बात है. इससे पहले (आर्यों से पूर्व) समाज के अंदर ऐसे किसी भी नियम का जिक्र नहीं मिलता. अमरनाथ प्रसाद और एम.बी गायजन अपनी पुस्तक ‘दलित लिट्रेचर ए क्रिटिकल एक्सप्लोरेशन’ की भूमिका में लिखते हैं “आर्यों से पहले का भारतीय इतिहास बताता है कि भारत में उच्च शिक्षित जाति पाई जाती थीं. उन लोगों का वर्ण अथवा चमड़ी का रंग अलग था. हमारे पास हमारी जानकार भाषा के अंदर उनके समाजिक जीवन, सभ्यता, रीति रिवाजों के कोई दस्तावेज मौजूद नहीं है. उस काल के आलेख विद्वानों के लिए आज भी रहस्य बने हुए हैं. हम भारतीय संस्कृति के बारे में जो कुछ भी जानते हैं वह हिंदू धर्म ग्रंथ जो पहले आर्य ग्रंथ कहलाते थे, से पता लग सका है. ये हैं वेद, उपनिषद स्मृतियां, महाकाव्य, पुराण और अन्य हस्तलिखित दस्तावेज. इस प्रकार वह अध्याय हमारे लिए अभी अज्ञात है. वैदिक ग्रंथों के अंदर लिखा है कि जो लोग आर्य नहीं थे उन्हें दास, दासू, पंचम वर्ण, बाद में शूद्र, बहुत नीचे व अछूत कहा जाने लगा.”

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इस प्रकार हम कह सकते हैं कि दलितों की पहचान हमें आर्यों के हस्तलिखितों से ही पता लगती है. डॉ. आंबेडकर भी इस खो दिए गए या आर्यों द्वारा नष्ट कर दिए गए पूर्व इतिहास के अध्ययन की बात करते हुए एक स्थान पर कहते हैं “मुझे खेद है कि भारत के इतिहास के विद्यार्थियों ने इसके अध्ययन की उपेक्षा की है.” जब कोई कौम अपने इतिहास से परिचित होती है वह अपनी वैचारिक लड़ाई उतनी ही दृढ़ता से लड़ सकती है, यह एक सामान्य बात है .भविष्य एतिहासिक तथ्यों द्वारा निर्मित होता है. दलितों को अपने इतिहास को समझने की आवश्यकता है, ताकि उन्हें अपनी जातीय पहचान छिपाकर ना जीना पड़े.

लेखक बलविंदर कौर नन्दनी दलित साहित्य पर शोधकर्ता (दिल्ली विश्वविद्यालय) व स्वतंत्र पत्रकार हैं…

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं.)