Dalit Success Stories

Dalit Success Story Sita Pariar Nepal first Dalit woman CDO know story of her struggle

Dalit Success Story: नेपाल की पहली दलित महिला सीडीओ बनीं सीता परियार, जानिए उनके संघर्ष की दास्‍तां

नई दिल्‍ली/काठमांडू : एक दलित परिवार (Dalit Family) में लड़की के रूप में जन्मी सीता परियार (Sita Pariyar) के लिए जीवन जन्‍म से ही बेहद संघर्ष भरा रहा. जातिवाद के सामाजिक संकट (Social Crisis of Casteism) का सामना करते हुए इससे लड़ने की दिशा में आज वह काम करने के लिए दृढ़ है. 44 साल की सीता परियार एक सिव‍िल सर्वेंट हैं, जोकि नेपाल की पहली दलित मुख्‍य जिला अधिकारी (Nepal First Dalit woman CDO Sita Pariyar) बनी हैं. नेपाल में दलित (Dalits in Nepal) लंबे समय से सरकार के अंगों से दूर रहे हैं, विशेषकर सिविल सेवाओं में केवल कुछ ही हैं. नेपाल के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (Nepal National Human Rights Commission) की एक रिपोर्ट भी दर्शाती है कि सरकारी तंत्र में दलित समुदाय का प्रतिनिधित्व न्यूनतम है. अपना नया कार्यभार संभालते हुए सीता ने कहा है कि अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए वह यह सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करेंगी कि किसी को भी उसकी जाति के कारण भेदभाव का सामना न करना पड़े.

दरअसल, बीते गुरुवार को 44 वर्षीय सीता परियार नेपाल की पहली दलित महिला मुख्य जिला अधिकारी (Nepal First Dalit woman CDO Sita Pariyar) बनीं. नेपाल के कास्की जिले के भोरले में (Nepal’s Bhorle of Kaski district) अपने माता-पिता की पांचवीं संतान के रूप में जन्मी सीता ने अपने शुरुआती दिनों से ही भेदभाव का अनुभव करना शुरू कर दिया था. वह अक्सर सोचती थी कि दूसरों द्वारा उनके साथ अलग और नीच तरीके से क्यों व्यवहार किया जा रहा है? दलित परिवार में लड़की के रूप में जन्मी सीता परियार के लिए समाज का व्‍यवहार हमेशा से दोहरा था.

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एक ऐसे समाज में जहां जाति आधारित भेदभाव अभी भी व्याप्त है और लड़कियां और महिलाएं अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं, सीता के साथ सबसे अच्छी बात यह हुई कि उनके माता-पिता ने उन्हें स्कूल भेजने का फैसला किया. जैसे-जैसे वह बड़ी हुई, उन्‍होंने महसूस किया कि उनकी जाति के कारण उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया गया. वह कहती हैं कि “चीजें आसान नहीं थीं. हमें पानी के नलों को छूने की अनुमति नहीं थी. विवाह समारोह और मंदिर हमारे लिए नहीं थे. हम जो कुछ भी छूते थे, लोग खाते-पीते नहीं थे.” सीता ने अपने साथ हुए भेदभाव के बारे में कहा. “यह सिर्फ मेरे बारे में नहीं है. हमारे देश में हर दलित सदस्य अपमान के इसी अनुभव से गुजरता है.”

लेकिन नेपाल की पहली महिला सीडीओ सीता परियर ने इन हालातों से हार मानने से इनकार कर दिया. वह कहती हैं कि “मैंने बाधाओं को दूर करने का फैसला किया. शायद मैंने जिस भेदभाव का सामना किया, उसने मुझे कुछ हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करने के लिए प्रेरित किया, ताकि मैं वापस लड़ सकूं और समाज से इस बुराई को खत्म करने की दिशा में काम कर सकूं. उसके लिए मुझे पढ़ाई करने की आवश्यकता थी. मुझे एक विश्वविद्यालय जाना था.”

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Dalit Success Story Sita Pariar Nepal first Dalit woman CDO

एक रिपोर्ट के अनुसार, सीता ने अपनी प्राथमिक शिक्षा एक स्कूल से पूरी की, जिसका नाम भी उनके गांव में सीता प्राइमरी स्कूल था. कास्की जिले के चंद्र प्रभु हायर सेकेंडरी स्कूल रूपा ग्रामीण नगर पालिका -6 (Chandra Prabhu Higher Secondary School Rupa Rural Municipality-6 of Kaski district) में अपनी माध्यमिक शिक्षा के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए काठमांडू (Kathmandu) आ गईं. यहां उन्होंने त्रि-चंद्र कॉलेज (Tri Chandra College) से समाजशास्त्र में मास्टर डिग्री प्राप्त की. उनकी हालिया पोस्टिंग भक्तपुर में सहायक मुख्य जिला अधिकारी के पद पर हुई थी.

भक्तपुर की मुख्य जिला अधिकारी रुद्र देवी शर्मा ने कहा “मैंने उनके साथ चार महीने काम किया. यह संयोग ही था कि हम दोनों महिलाएं थीं. सीता प्रतिबद्धता और अखंडता के साथ एक मेहनती अधिकारी हैं. यह मेरे लिए भी गर्व का क्षण है कि मेरे सहयोगी को पदोन्नत किया गया है. वह दलित समुदाय की पहली मुख्य जिला अधिकारी बनी हैं. यह सब उसकी मेहनत की वजह से है.”

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सीता ने 4 सितंबर 2011 को ओपन कैटेगरी से सेक्शन ऑफिसर के रूप में सिविल सर्विस में प्रवेश किया था. उन्होंने 2015 और 2017 में क्रमशः दोलखा और भोजपुर जिलों के लिए स्थानीय विकास अधिकारी के रूप में काम किया. फिर उन्होंने तीन स्थानीय निकायों के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी के रूप में कार्य किया: चंद्रगिरी नगर पालिका (2018), जनकपुर धाम उप-महानगरीय शहर (2019) और (2020) में कीर्तिपुर नगर पालिका Chandragiri Municipality (2018), Janakpur Dham Sub-Metropolitan City (2019) and Kirtipur Municipality in (2020).

सीता के 52 वर्षीय भाई श्याम ने साझा किया कि उन्हें इस बात पर गर्व है कि उनकी बहन ने वह हासिल किया है जो उनके समुदाय की किसी महिला ने नहीं किया है. सिलाई का काम करने वाले उनके भाई ने कहा कि “हमारे माता-पिता नहीं रहे. अगर वे जीवित होते, तो उन्हें निश्चित रूप से उस पर इतना गर्व होता. सभी बाधाओं के बावजूद मेरे माता-पिता ने उसे स्कूल और कॉलेज भेजने का फैसला किया. मेरे पिता को उसे शिक्षित करने की बहुत इच्छा थी.”

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उल्‍लेखनीय है कि नेपाल में दलित (Dalits in Nepal) लंबे समय से सरकार के पदों से दूर हैं. सिविल सेवाओं में उनका प्रतिनिधित्‍व ना के बराबर ही है. नेपाल राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (Nepal National Human Rights Commission) की पिछले साल की रिपोर्ट के मुताबिक, सिविल सेवाओं में कुल 88,578 लोगों में से केवल 1,971 दलित समुदाय (Nepal Dalit Community in Civil Services) से हैं, जोकि 0.2 प्रतिशत है. रिपोर्ट से पता चलता है कि नेपाल पुलिस में दलित समुदाय (Dalit community in Nepal Police) की उपस्थिति 9.45 प्रतिशत, नेपाल सेना में 8.14 प्रतिशत और न्यायिक क्षेत्र में सिर्फ 1 प्रतिशत है.

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जाति-आधारित भेदभाव और हाशिए पर जाने (caste-based discrimination and marginalisation) का अध्ययन करने वाले एक स्वतंत्र थिंक टैंक समता फाउंडेशन के कार्यकारी अध्यक्ष प्रदीप परियार (Pradip Pariyar, Executive chair of Samata Foundation) ने सीता की नियुक्ति को मुख्य जिला अधिकारी के रूप में पूरे दलित समुदाय (Dalit Community) के लिए एक सकारात्मक और गर्व का क्षण बताया और जाति-आधारित भेदभाव के खिलाफ लड़ाई में मील का पत्थर बताया. प्रदीप कहते हैं कि “अगर हम गंभीर रूप से देखें, तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम इसे 21वीं सदी में मना रहे हैं. यह नेपाल और हम नेपालियों की कठोर वास्तविकता को भी दर्शाता है कि कैसे हमारे समाज को अभी भी बहुत अधिक परिवर्तन की आवश्यकता है.”

नया कार्यभार संभालने के वक्‍त सीता परियार (Nepal First Dalit woman CDO Sita Pariyar) ने कहा कि अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए वह यह सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करेगी कि किसी को भी उनकी जाति के कारण भेदभाव का सामना न करना पड़े. यह पूछे जाने पर कि क्या विभिन्न कार्यालयों में सेवा करते समय उन्हें कभी भेदभाव का सामना करना पड़ा? उन्होंने कहा कि “उनके सहकर्मी और सहकर्मी हमेशा उनके साथ अच्छे रहे हैं. लेकिन तथ्य यह है कि जातिगत भेदभाव एक बड़ी समस्या है और यह हर जगह व्याप्त है.” उन्होंने याद किया कि जब उन्हें भोजपुर में स्थानीय विकास अधिकारी नियुक्त किया गया था तो लोग उन्हें अविश्वास की नजर से देखते थे.

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Matadin Bhangi Matadin Valmiki who started the 1857 freedom struggle

Matadin Valmiki : मातादीन वाल्‍मीकि, जिन्‍होंने 1857 स्‍वतंत्रता क्रांति की नींव रखी

जो जाति व्यवस्था हिन्दू धर्म के लिए हमेशा अभिशाप रही है, उसी ने भारत की स्‍वतंत्रता क्रांति की पहली नींव रखी. वैसे तो भारत की स्‍वतंत्रता क्रांति की पटकथा 31 मई 1857 को लिखी गई, लेकिन मार्च में ही विद्रोह छिड़ गया था और इसके असली सूत्रधार थे वीर महानायक मातादीन वाल्‍मीकि (Matadin Valmiki), जिन्‍हें मातादीन भंगी (Matadin Bhangi) के नाम भी जाना जाता है. वह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की एक कार्ट्रिज निर्माण इकाई में काम करते थे. वही, पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने 1857 के विद्रोह के बीज बोए थे.

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दरअसल, बैरकपुर छावनी (Barrackpore Cantonment) कोलकत्ता (Kolkata) से केवल 16 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद थी. उस समय मृत जानवरों के चमड़े और त्वचा के साथ काम करना निम्न जातियों का व्यवसाय माना जाता था. रूढ़िवादी उच्च जाति के हिंदू उन्हें “अशुद्ध” मानते थे. एक दिन इस फैक्ट्री में कारतूस बनाने वाले मातादीन वाल्‍मीकि (Matadin Valmiki) को प्यास लगी, तब उन्‍होंने मंगल पांडेय नामक सैनिक से पानी मांगा. मंगल पांडे उच्‍च जाति से थे, तो उन्‍होंने मातदीन को नीची जाति का होने के चलते पानी पिलाने से इंकार कर दिया.

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बताया जाता है कि इससे मातादीन भंगी काफी नाराज हो गए और उन्‍होंने मंगल पांडेय से कहा क‍ि तुम्हारा धर्म कैसा है, जो एक प्यासे को पानी पिलाने की इजाजत तो नहीं देता, लेकिन गाय जिसे तुम मां मानते हो, सूअर जिससे मुसलमान नफरत करते हैं, उसी के चमड़े से बने कारतूस को मुंह से खोलते हो. यह सुनकर मंगल पांडेय चकित रह गए.

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इसके बाद उन्होंने मातादीन को पानी पिलाया और इस बातचीत के बारे में उन्होंने बैरक के सभी लोगों को बताया. इस सच से वाकिफ होने पर मुसलमान भी बौखला गए.

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बताया जाता है कि इसी के बाद मंगल पांडेय ने विद्रोह कर दिया. मंगल पांडे द्वारा लगाई गई विद्रोह की यह चिन्गारी ज्वाला बनी और एक महीने बाद ही 10 मई सन 1857 को मेरठ की छावनी में सैनिकों ने बगावत कर दी, जोकि क्रांति की ज्वाला बनकर पूरे उत्तरी भारत में फैल गई. बाद में अंग्रेजों ने जो चार्जशीट बनाई, उसमें पहले नाम मातादीन भंगी (Matadin Bhangi) का था. विद्रोह फैलाने के जुर्म में अंग्रेजों ने मातादीन को भी गिरफ्तार कर लिया था, जिसके बाद मातादीन को भी अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया था.

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Bahujan Nayak Periyar Lalai Singh Yadav who known as Periyar of North India

बहुजन नायक ललई सिंह यादव, जो उत्तर भारत के ‘पेरियार’ कहलाए…

पेरियार ललई सिंह यादव (Periyar Lalai Singh Yadav) भारत में ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के खिलाफ सड़क से लेकर अदालत तक लड़ाई लड़ने वाले अगुआ नायकों में एक रहे हैं. उन्‍हें हिन्दू जाति व्यवस्था से इतनी नफरत थी कि उन्होंने अपने नाम से ‘यादव’ शब्द तक हटा दिया था. वे हिंदी पट्टी में उत्तर भारत के पेरियार के रूप में प्रसिद्ध हुए. दरअसल, ललई सिंह पेरियार की चर्चित किताब ‘सच्ची रामायण’ (Sacchi Ramayana) को हिंदी में लाने और उसे पाबंदी से बचाने के लिए लंबा संघर्ष करने वाले बहुजन क्रांति के नायक हैं. 1968 में ललई सिंह ने ‘द रामायना: ए ट्रू रीडिंग’ का हिन्दी अनुवाद कराया और उसे ‘सच्ची रामायण’ नाम से प्रकाशित करवाया. पेरियार की सच्ची रामायण का हिंदी अनुवाद आते ही उत्तर भारत में एक बड़ा तूफान उठ खड़ा हुआ था. इस किताब की इतनी चर्चा हुई कि हिन्दू धर्म के तथाकथित रक्षक भड़क उठे और इसके विरोध में सड़कों पर उतर आए. नतीजतन, तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार (Uttar Pradesh Govt) ने दबाव में आकर 8 दिसंबर 1969 को धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप में किताब को जब्त कर लिया और यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में गया.

ब्राह्मणवाद (Brahminism) के खिलाफ आजीवन संघर्ष करने वाले ‘पेरियार’ ललई सिंह (Periyar Lalai Singh Yadav) को आज उनके जन्‍मदिवस (इनका जन्‍म 1 सितम्बर 1911 को हुआ था) पर श्रद्धांजलि देते हुए dalitawaaz.com की ओर से यह लेख उन्‍हें समर्पित…

बहुजन नायक पेरियार ललई सिंह (Bahujan Nayak Periyar Lalai Singh) का जन्म 1 सितम्बर 1911 को कानपुर देहात के झींझक रेलवे स्टेशन के पास कठारा गांव में हुआ. 1933 में वह मध्‍यप्रदेश के ग्वालियर के सशस्त्र पुलिस बल में सिपाही के रुप में भर्ती हुए, लेकिन कांग्रेस के स्वराज का समर्थन करने के कारण, जिसे ब्रिटिश हुकूमत में जुर्म माना जाता था, उन्‍हें दो साल बाद बर्खास्त कर दिया गया. हालांकि अपील पर उन्‍हें बहाल कर दिया गया. उन्होंने ग्वालियर में 1946 में ‘नान-गजेटेड मुलाजिमान पुलिस एण्ड आर्मी संघ’ की स्थापना की, जिसका मकसद उच्च अधिकारियों से लड़ते हुए पुलिसकर्मियों की समस्याएं उठाना था.

ललई सिंह ने साल 1946 में ‘सिपाही की तबाही’ नामक एक किताब लिखी. हालांकि यह प्रकाशित तो नहीं हो पाई, लेकिन उसे टाइप करते हुए सिपाहियों में बांट दिया गया. हालांकि सेना इंस्पेक्टर जनरल को जैसे ही इस किताब के बारे में पता चला तो उनकी ओर से उसे जब्त कर लिया गया.

करीब एक साल बाद ललई सिंह ने ग्वालियर पुलिस और आर्मी में हड़ताल करा दी, जिसके चलते उन्‍हें 29 मार्च 1947 को गिरफ्तार कर लिया गया. उन पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें 5 साल की सश्रम सजा सुनाई गई. वह 9 महीने तक जेल में रहे. भारत के आजाद होने पर ग्वालियर स्टेट के भारत गणराज्य में विलय के बाद वह 12 जनवरी 1948 को जेल से रिहा कर दिए गए.

साल 1950 में सरकारी सेवा से मुक्त होने के बाद ललई सिंह ने अपना जीवन पूरी तरह बहुजन समाज की मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया. उन्हें इसका आभास हो चुका था कि ब्राह्मणवाद के खात्मे के बिना बहुनजों की मुक्ति नहीं हो सकती.

इसके बाद पेरियार से पहली मुलाकात के समय ही ललई सिंह ने उनकी पुस्तक ‘रामायण : ए ट्रू रीडिंग’ को हिंदी में प्रकाशित करने का मन बना लिया था. इसके लिए उन्होंने पेरियार से चर्चा की और उन्‍हें सहमति मिल गई. 1968 में ही ललई सिंह ने ‘द रामायना: ए ट्रू रीडिंग’ का हिन्दी अनुवाद कराकर ‘सच्ची रामायण’ नाम से प्रकाशित कराया, जिसको लेकर काफी बवाल हुआ और हिंदूवादियों ने विरोध जताया और सरकार ने किताब को जब्‍त कर लिया. मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में गया.

यूपी सरकार की तरफ से कोर्ट में कहा गया कि यह किताब विशाल हिंदू जनसंख्या की पवित्र भावनाओं पर प्रहार करती है और लेखक ने खुली भाषा में राम और सीता एवं जनक जैसे दैवी चरित्रों पर कलंक मढ़ा है. इसलिए इस किताब पर प्रतिबंध लगाना जरूरी है. इस पर ललई सिंह यादव के वकील बनवारी लाल यादव ने ‘सच्ची रामायण’ के पक्ष में जबर्दस्त पैरवी की. 19 जनवरी 1971 को हाईकोर्ट से वह केस जीते. कोर्ट ने किताब जब्ती का आदेश निरस्त कर दिया और सरकार को निर्देश दिया कि वह सभी जब्त पुस्तकें वापस करे. साथ ही ललई सिंह को 300 रुपए मुकदमे का खर्च दिया जाए.

बाद में यूपी सरकार इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट अपील में गई. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में ‘उत्तर प्रदेश बनाम ललई सिंह यादव’ नामक फ़ैसला 16 सितम्बर 1976 को आया, जोकि पुस्तक के प्रकाशक के पक्ष में रहा. सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले को सही माना और राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया.

सच्ची रामायण के पक्ष में मुकदमा जीतने के बाद वह दलितों (Dalit) के नायक बन गए. उन्‍होंने वर्ष 1967 में हिंदू धर्म का त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया और अपने नाम से यादव शब्द हटा दिया. इसके पीछे उनकी गहरी जाति विरोधी चेतना थी, जिसका मकसद जाति विहीन समाज के लिए संघर्ष था.

उन्‍होंने बौद्ध धर्मानुयायी बहुजन राजा अशोक के आदर्श को ध्‍यान में रखते हुए ‘अशोक पुस्तकालय’ नाम से प्रकाशन संस्था कायम की और अपना प्रिन्टिंग प्रेस लगाई, जिसका नाम ‘सस्ता प्रेस’ रखा. उन्होंने पांच नाटक लिखे, अंगुलीमाल नाटक, शम्बूक वध, सन्त माया बलिदान, एकलव्य और नाग यज्ञ नाटक. गद्य में भी उन्होंने तीन किताबें लिखीं, शोषितों पर धार्मिक डकैती, शोषितों पर राजनीतिक डकैती एवं सामाजिक विषमता कैसे समाप्त हो?

ललई सिंह के साहित्य ने बहुजनों में ब्राह्मणवाद के विरुद्ध विद्रोही चेतना पैदा की और उनमें श्रमण संस्कृति और वैचारिकी का नवजागरण किया. एक सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और प्रकाशक के रूप में उन्होंने अपना पूरा जीवन ब्राह्मणवाद के खात्मे और बहुजनों की मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया. 7 फरवरी 1993 को उन्होंने अंतिम विदा ली.

Dalit Success Story Dalit IPS officer Praveen Kumar who gave new identity to Dalits

Dalit Success Story: दलित IPS ऑफि‍सर प्रवीण कुमार, जिन्‍होंने दलितों को नई पहचान दी

“मैं अपने शेष जीवन का उपयोग महात्मा फुले दंपत्ति, बाबा साहब डॉ. बी आर आंबेडकर, कांशीराम और सामाजिक न्याय के लिए मशाल जलाने वाले अन्‍य महापुरुषों के अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए करूंगा “… एक दलित आईपीएस अफसर आरएस प्रवीण कुमार (Senior Dalit IPS officer Dr RS Praveen Kumar) ने अपने पद से रिजाइन देने के बाद ये महान विचार सोशल मीडिया पर व्‍यक्‍त किए. प्रवीण कुमार ने मुख्य सचिव सोमेश कुमार को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की मांग करने वाला पत्र सौंपने के बाद अपने सोशल मीडिया पोस्ट में यह बात कही. (Dalit Success Story)

दलित IPS आरएस प्रवीण कुमार (Senior Dalit IPS officer Dr RS Praveen Kumar) वो हैं, जिन्‍होंने दलितों को नई पहचान दी है. जब वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी डॉ आरएस प्रवीण कुमार (IPS RS Praveen Kumar) ने बीते सोमवार को सरकारी सेवा से स्वेच्छा से पद छोड़ने की घोषणा की, तो यह निश्चित रूप से तेलंगाना सामाजिक कल्याण आवासीय शिक्षण संस्थानों (Telangana Social Welfare Residential Educational Institutions Society (TSWREIS) के असंख्य छात्रों के लिए एक बड़ा झटका था. TSWREIS को प्रवीण कुमार ने पिछले नौ वर्षों में उत्कृष्टता के संस्थानों में बदल दिया है.

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दरअसल, तेलंगाना सरकार ने अनुसूचित जाति (एससी) समुदायों के सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को ध्‍यान में रखते हुए बिना किसी आर्थिक बोझ के एससी समुदायों के लिए अलग स्कूल शुरू किए थे, जिसका मकसद अनुसूच‍ित जाति के छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक बेहतर पहुंच प्रदान करना है. इसके तहत मुख्य रूप से अनुसूचित जाति समुदायों के आबादी वाले क्षेत्रों में समाज कल्याण आवासीय विद्यालयों की स्थापना की गई. २६८ विघालय/शिक्षण संस्‍थान वाली यह सोसायटी १५०००० छात्रों को स्नातक तक अंग्रेजी माध्यम में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करती.

यह एक निर्विवाद तथ्य है कि तेलंगाना सोशल वेलफेयर रेजिडेंशियल एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस सोसाइटी (TSWREIS) के सचिव के रूप में प्रवीण कुमार ने दलितों के लिए कम से कम तेलंगाना में पिछले नौ वर्षों में एक नई पहचान क्रांति की है.

दरअसल, प्रवीण कुमार को दलित शब्द पसंद नहीं है. उनके अनुसार दलित शब्द हाशिये पर पड़े वर्गों पर उत्पीड़न के प्रतीक के रूप में थोपा गया था, इसलिए उन्होंने एक नया शब्द गढ़ा – SWAERO, जिसमें SW का अर्थ समाज कल्याण और “एयरो” आकाश के लिए प्रयोग किया गया. उनका मानना है कि अवसर दिए जाने पर अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए आकाश तक सीमा है.

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TSWRERIS के सचिव के रूप में कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि समाज कल्याण संस्थानों के सभी छात्र अपने नाम के साथ “Swaero” अवश्य जोड़े. यहां तक आईपीएस अधिकारी ने खुद के नाम के आगे भी स्‍वेरो शब्‍द जोड़ा है. इस तरह उनका नाम डॉ आर एस प्रवीण कुमार स्वेरो है.

केवल उनके छात्र ही नहीं, तेलंगाना में पूरे दलित समुदाय के लिए स्वेरो शब्द एक चर्चा का विषय बन गया है, जिससे उन्हें एक नई पहचान मिली है. वे अब खुद को “स्वारोस” कहने में गर्व महसूस करते हैं और अपने दैनिक जीवन में उनका उल्लेख करते हैं, चाहे वह शादी के कार्ड में हो या उनके व्यावसायिक उपक्रमों में या अन्य व्यवसायों में.

प्रवीण कुमार ने एक स्वेरो एंथम भी बनाया है, जिसे समाज कल्याण संस्थानों के छात्र हर दिन पढ़ते हैं, ताकि उन्‍हें अपनी पहचान की भावना महसूस हो और उन्हें अपनी वास्तविक क्षमता को फिर से खोजने में मदद मिल सके. उन्होंने छात्रों के लिए 10 आज्ञाएं भी बनाई हैं, जिनमें पहली कहती है: “मैं किसी से कम नहीं हूं,” और अंतिम कहती है: “मैं कभी हार नहीं मानूंगा.”

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पिछले कुछ वर्षों में, यह “Swaero आंदोलन” सोशल मीडिया और सार्वजनिक अभियान के माध्यम से पिछड़े वर्गों में फैल गया है. यह अब एक जन आंदोलन के रूप में बन गया है, जिसने उन्हें समाज में उनके लिए गर्व और सम्मान की भावना खोजने में मदद की है.

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र, 1995-बैच के आईपीएस अधिकारी डॉ. प्रवीण कुमार का मानना था कि हाशिए पर पड़े वर्गों के उत्थान के लिए अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा ही एकमात्र तरीका है. यही कारण है कि उन्होंने सामाजिक कल्याण आवासीय संस्थानों में शैक्षिक मानकों को बेहतर बनाने के लिए बहुत प्रयास किए.

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वे शैक्षिक विशेषज्ञों को सेवाओं में लाए, अध्यापन में नवीनतम रुझानों की शुरुआत की और शिक्षकों को लगातार नई शिक्षण विधियों को अपनाने की तरफ लगे रहे. उनके प्रयासों ने छात्रों के आत्मविश्वास को इतना बढ़ाया कि कई सामाजिक कल्याण संस्थानों के छात्र तथाकथित कॉन्वेंट स्कूलों के कई छात्रों की तुलना में धाराप्रवाह और बेहतर अंग्रेजी बोल सकते हैं.

न केवल शिक्षाविदों में प्रवीण कुमार ने अपने छात्रों के सर्वांगीण विकास पर भी ध्यान केंद्रित किया और उन्हें खेल, साहसिक खेलों और अन्य पाठ्येतर गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया. निजामाबाद जिले के एक आदिवासी छात्र मालवथ पूर्णा को दिए गए उनके अपार प्रोत्साहन को कौन भूलेगा, जो 2014 में दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह करने वाली दुनिया की सबसे कम उम्र की लड़की बनी थी. प्रवीण कुमार के पूर्णा को प्रोत्साहन से प्रेरणा लेते हुए कई दलित छात्रों ने पर्वतारोहण और घुड़सवारी और एथलेटिक्स जैसे खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है.

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23 नवंबर, 1967 को महबूबनगर जिले के आलमपुर में एक गरीब परिवार में जन्मे प्रवीण कुमार अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता, शिक्षकों को देते हैं, जिन्होंने उन्हें गरीबी, अपमान और सामाजिक भेदभाव का सामना करते हुए एक आईपीएस अधिकारी के रूप में तैयार किया. उन्होंने पशु चिकित्सा विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की, हार्वर्ड विश्वविद्यालय गए और एडवर्ड एस मेसन फेलो बन गए.

लगभग 17 वर्षों तक पुलिस सेवा में रहने के बाद प्रवीण कुमार ने हाशिए के वर्गों के छात्रों की सेवा करने के अपने सपने को साकार करने के लिए TSWREIS में काम करने का विकल्प चुना.

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