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दलित वर्ग ध्यान दें! उत्पीड़न की घटनाओं पर एक क्लिक में करें शिकायत

नई दिल्ली. देशभर में दलित वर्ग के लोगों के साथ होने वाले उत्पीड़न (Dalit oppression) को ध्यान में रखते हुए अनुसूचित जाति आयोग (Scheduled Castes Commission) ने एक्शन लिया है. दलितों के साथ जातिगत आधार पर किसी तरह का दुर्व्यवाहर न हो इसके लिए अनुसूचित जाति आयोग ने एक शिकायत पोर्टल को लॉन्च किया है. इस पोर्टल के जरिए अनुसूचित जाति का कोई भी व्यक्ति देश के किसी भी हिस्से से अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है.

शिकायतों की वर्तमान स्थिति और अन्य चीजों की भी सुविधा

– इस पोर्टल पर शिकायत दर्ज करवाने वाले दलितों के लिए ई-फाइलिंग की सुविधा भी है.

– आपकी शिकायत की वर्तमान स्थिति क्या है, उस पर क्या एक्शन लिया गया पोर्टल पर उसे भी देखा जा सकता है.

-इस पोर्टल के माध्यम के जरिए आप दस्तावेज़ और ऑडियो / वीडियो फ़ाइलों को भी अपलोड कर सकते हैं.

आधिकारिक जानकारी के अनुसार इस पोर्टल के माध्यम से विशेष रूप से अनुसूचित जाति की आबादी की शिकायतों और उसके निवारण को व्यवस्थित करना है.

देश के किसी भी हिस्से में रहने वाले दलितों के साथ किसी भी तरह का शारीरिक या मौखिक तौर पर उत्पीड़न होता है तो वो ncsc.negd.in वेबसाइट पर लॉगिन कर सकते हैं और शिकायत दर्ज करवा सकते हैं.

 

Dalit women

स्तन ढकने का हक पाने के लिए दलितों का आंदोलन और विद्रोही बन गए अय्यंकालि

आधुनिक और स्वतंत्रत भारत में दलितों और पिछड़े वर्ग के लोगों में आत्म सम्मान की भावना पैदा करने, महिलाओं को एक समान धारा में लाने में ज्योतिबा फुले, डॉ. भीमराव आंबेडकर, नारायण गुरु और ईवी. रामासामी पेरियार की अहम भूमिका मनाई है. जब बात दलितों के आत्म सम्मान को बढ़ावा देने की आती है तो सूची में पहला नाम आंबेडकर का होता है. इस दौरान हम महात्मा अय्यंकालि (Mahatma Ayyankali) को नकार जाते हैं.

आजादी से पूर्व भारत में रहने वाली दलित महिलाओं (Dalit Women) की अस्मिता की रक्षा के लिए अय्यंकालि के योगदान को भूल पाना नामुमकिन है. ये भारत का वो दौर था जब दलित महिलाओं को अपने ही स्तन बढ़ने का अधिकार प्राप्त नहीं था. दलित महिलाओं को ऊंची जाति की उपस्थिति में पहले उन्हें अपने स्तन के कपड़े हटा लेने होते थे.

सिर्फ कंठहार पहनने की थी इजाजत
ऊंची जाति के सामने महिलाओं को सिर्फ कंठहार पहनने की इजाजत थी. गुलामी के इस परिधान से दलित महिलाओं को मुक्ति दिलाने के लिए अय्यंकालि ने दक्षिणी त्रावणकोर से आंदोलन की शुरुआत की.

ऊंची जाति को पसंद नहीं आया विद्रोह
एक सभा के दौरान अय्यंकालि ने सभी दलित स्त्रियों ने कहा कि वो गुलामी और जाति का प्रतीक आभूषणों को छोड़कर सामान्य ब्लाउज पहनें. ताकि उनके स्तनों पर किसी कि भी नजर न पड़े और ऊंची जाति की महिलाओं की तरह उन्हें भी सम्मान की निगाहों से देखा जाए. अय्यंकालि के आंदोलन में शामिल सभी महिलाओं ने ऐसा ही किया.

हालांकि ऊंची जाति की महिलाओं को यह पसंद नहीं आया. दलित महिलाओं को सामान्य ब्लाउज पहनने से रोकने के लिए परिणति दंगे हुए है. लेकिन इस बार दलित महिलाएं अय्यंकालि के कारण झुकी नहीं. उन्होंने ठान लिया कि वो अब सामान्य ब्लाउज पहनकर ही रहेंगी.

 

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समझौते के लिए तैयार हुए सवर्ण
अंततः सवर्णों को समझौते के लिए तैयार होना पड़ा. अय्यंकालि और नायर सुधारवादी नेता परमेश्वरन पिल्लई की उपस्थिति में सैंकड़ों दलित महिलाओं ने गुलामी के प्रतीक ग्रेनाइट के कंठहारों को उतार फेंका. समझौते के अनुरूप दलितों महिलाओं को भी सामान्य ब्लाउज पहनने का हक मिला. ऐसा कहा जाता है कि इस आंदोलन के बाद देश में दोबारा किसी भी दलित महिला को बिना ब्लाउज के नहीं रहना पड़ा. सवर्ण जाति की तरह की उनका जीवन सामान्य हो गया.

 

एक नजर में…

आंबेडकर पर भरोसा नहीं करते थे नेहरू? ये घटनाएं हैं साक्ष्य

Dr-Nisha-Singh DR Ambedkar Dalit Chetna

जब बाबा साहब ने दलित लेखकों से कहा था- ‘दलितों की बहुत बड़ी दुनिया है, इसे भूलना मत’

ब्‍लॉग- डॉ. निशा सिंह

स्वतंत्रता के बाद जो लेखन के क्षेत्र में विमर्श प्रारंभ हुआ, उसने नब्बे के दशक तक आते-आते पूरी रफ्तार पकड़ ली. राजनीति के क्षेत्र में दलित विमर्श या आंदोलन भले भटक गया हो, लेकिन लेखन के क्षेत्र में दलित विमर्श पूरी तरह से अम्बेकरवादी हैं. भारतीय राजनीति में 1990 का दशक सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन का दशक माना जाएगा, क्योंकि इसी दशक में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुईं और दलित-पिछड़ी जातियों को शासन-प्रशासन में भागीदारी हासिल हुई . इसके बाद दलित विमर्श ने अपना व्यापक रूख अखतियार कर लिया.

दलित विमर्श 21 वीं सदी में जाति, भाषा, धर्म, लिंग, वर्ण, राष्ट्र आदि की सीमा को लांघकर अन्तरराष्ट्रीय स्तर का विमर्श बन गया है. ‘दलित’ शब्द का प्रयोग केवल हाशिए के लोगों को समान भाव से पुकारने या देखने के लिए ही नहीं हुआ है, बल्कि यह शब्द क्रांति के प्रतीक बोधक रूप में प्रयुक्त हुआ.

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दलित शब्द, दलित लेखन तथा दलित विमर्श को ओम प्रकाश वाल्मीकि के शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है कि “दलित शब्द दबाए गए, शोषित, पीडि़त, प्रताडि़त के अर्थों के साथ जब साहित्य से जुड़ता है तो विरोध और नकार की ओर संकेत करता हैं. वह नकार या विरोध चाहे व्यवस्था का हो, सामाजिक विसंगतियों या धार्मिक रूढि़यों, आर्थिक विषमताओं का हो या भाषा, प्रान्त के अलगाव का हो या साहित्यिक परम्पराओं, मानदंडों या सौन्दर्यशास्त्र का हो. दलित साहित्य नकार का साहित्य है, जो संघर्ष से उपजा है तथा जिसमें समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का भाव है और वर्ण व्यवस्था से उपजे जातिवाद का विरोध है.

दलित विमर्श एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन है, जो इस वर्ग के लोगों में अपने अधिकारों के प्रति अपने होने का अहसास कराने के लिए अपने अन्दर आत्मसम्मान का भाव जाग्रत करता है. दलित विमर्श दलित समाज में चेतना पैदा करने वाला लेखन है. चेतना से तात्पर्य है कि “दलित की व्यथा, पीड़ा, शोषण का विवरण देना या बखान करना ही दलित चेतना नहीं या दलित पीड़ा का भावुक और अश्रु-विगलित वर्णन जो मौलिक चेतना से विहीन हो. चेतना का सीधा संबंध दृष्टि से होता है जो दलितों की सांस्कृतिक ऐतिहासिक, सामाजिक भूमिका की छवि के तिलिस्म को तोड़ती है. यह है दलित चेतना.”

दलित विमर्श: जब महात्‍मा फुले-पेरियार ने जातिवाद और ब्राह्मणवाद का विरोध किया

आगे ओमप्रकाश वाल्मीकि चेतना की विचारधारा को स्पष्ट करते हैं कि “चेतना का सीधा संबंध आंबेडकर दर्शन से है. वही प्रेरणास्रोत भी हैं. सामाजिक उत्पीड़न, सामन्ती सोच, वर्ण व्यवस्था से उपजी ऊंच-नीच ने दलितों को शताब्दियों से मानसिक गुलामी में जकड़कर रखा हुआ है. उसकी मुक्ति के तमाम रास्ते बन्द थे. इस गुलामी से मुक्त होने का विचार ही दलित चेतना है, जिसे ज्योतिबा फुले और डॉ. आंबेडकर ने दार्शनिक आधार दिया, जिसका केन्द्र बिन्दु यही शोषित सामान्य जन है.

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दलित विमर्श का केन्द्र मनुष्य का भौतिक वास्तविक जीवन है. यहां दलितों के भीगे हुए यथार्थ की अभिव्यक्ति होती है. दलित विमर्शकार या दलित लेखक बाबा साहब की उन पंक्तियों को आज साकार रूप दे रहे हैं, जिनमें दलित विचारकों, चिंतकों और लेखकों को संबोधित करते हुए बाबा साहेब ने कहा था कि हमारे देश में उपेक्षितों और दलितों की बहुत बड़ी दुनिया है. इसे भूलना नहीं चाहिए. उनके दुखों को, उनकी व्यथाओं को पहचानना जरूरी है और अपने साहित्य के द्वारा उनके जीवन को उन्नत करने का प्रयत्न करना चाहिए. इसी में सच्ची मानवता है.

लेखक डॉ. निशा सिंह दिल्‍ली यूनिवर्सिटी के राम लाल आनंद कॉलेज (साउथ कैंपस) में गेस्‍ट लेक्‍चरर हैं…

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं.)

 

Dr-Nisha-Singh

दलित विमर्श: जब महात्‍मा फुले-पेरियार ने जातिवाद और ब्राह्मणवाद का विरोध किया

ब्‍लॉग- डॉ. निशा सिंह

दलित (Dalit) विमर्श क्या हैं ?दलित विमर्श का क्षेत्र कितना हैं ? इसका अर्थ क्या हैं? आदि सवालों का जवाब दलित चिन्तक कंवल भारती इस प्रकार देते हैं कि दलित विमर्श सिर्फ एक जाति का विमर्श नहीं है, जैसा की आम धारणा हैं कि किसी दलित समस्या को लेकर किया गया विमर्श ही दलित विमर्श हैं.

दलित विमर्श के केन्द्र में दलित समस्या को नहीं नकारा जा सकता. पर यह समस्या एक राष्ट्रीय समस्या के रूप में हैं. इसके केन्द्र में दलित मुक्ति का प्रश्न राष्ट्रीय मुक्ति का प्रश्न है. दलित विमर्श के छोर में वे सारे सवाल हैं, जिनका संबंध भेदभाव से हैं. चाहे यह भेदभाव जाति के आधार पर हो, रंग के आधार पर हो, नस्ल के आधार पर हो, लिंग के आधार पर हो या फिर धर्म के ही आधार पर क्यों न हो.”

दलित विमर्श का आरंभ संसार में उपस्थित सभी प्रकार के भेदभावों को नकारकर मानवता की स्थापना के लिए हुआ हैं. दलित विमर्श सदियों से चली आ रही ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था को अस्वीकार कर समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व पर आधारित समाज व्यवस्था में विश्वास करता है.

नवजागरण के दौरान समाज सुधारकों ने जो भी आंदोलन चलाए वे हिन्दु धर्म में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करने के लिए तथा इस्लाम व ईसाई मत के प्रभाव को कम कर हिन्दू धर्म को बढ़ाना था. इसके बरक्ष दलित आन्दोलन का “ध्येय न तो हिन्दू धर्म की रक्षा करना था और न ईसाई मत और इस्लाम के प्रभाव को रोकना था. उनका मुख्य ध्येय दलित-मुक्ति था और इसके लिए उनका जोर वर्णव्यवस्था के उन्मूलन पर” रहा है.

महात्‍मा ज्‍योतिबा फुले (Mahatma Jyotiba Phule) (1827-1890) नवजागरणकालीन पहले दलित आन्दोलनकर्ता या क्रांतिकारी थे, जिन्होंने ब्राह्मणवाद और जाति-प्रथा के खिलाफ विद्रोह के साथ-साथ दलित-पिछड़ी जातियों व महिलाओं की स्वतंत्रता के लिए सामाजिक आन्दोलन प्रारंभ किया. उन्होंने 1873 में ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की और अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘गुलाम-गिरी’ की रचना की.

इनके माध्यम से महात्‍मा ज्‍योतिबा फुले ने ब्राह्मणवाद का खंडन करते हुए समाज में जाग्रति पैदा की. इनके समानान्तर अल में नारायण गुरु (1854) जाति-प्रथा के विरुद्ध आंदोलन कर रहे थे. उन्होंने ‘एक जाति, एक धर्म व एक ईश्वर’ की घोषणा करते हुए नारा दिया कि जाति मत पूछो, जाति मत बताओ और जाति के बारे में मत सोचो.” इससे जाति प्रथा अपने आप समाप्त हो जाएगी.

इनके बाद दक्षिण भारत में मद्रास (तमिलनाडु) में जन्मे पेरियार रामास्वामी नायकर (Periyar E V Ramasamy) (1879-1973) ने जातिवाद और ब्राह्मणवाद के खिलाफ आन्दोलन चलाया. ये ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे.

इनका कहना था कि ‘ईश्वर नहीं है, जिन्होंने ईश्वर का आविष्कार किया वह मूर्ख हैं. जिसने ईश्वर का प्रचार किया वह दुष्ट है और जिसने ईश्वर की पूजा की, यह असभ्य हैं.” उत्तर भारत में स्वामी अछुतानंद (1879-1933) ने ‘आदि हिन्दू आन्दोलन’ के माध्यम से जातिवाद और ब्राह्मणवाद का विरोध कर दलित आन्दोलन के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया.

इस लेख के दूसरे अध्‍याय में पढ़ें बाबा साहब डॉ.भीमराव आंबेडकर ने किस आंदोलन से ऊर्जा ग्रहण कर महाड़ आंदोलन शुरू किया…

लेखक डॉ. निशा सिंह दिल्‍ली यूनिवर्सिटी के राम लाल आनंद कॉलेज (साउथ कैंपस) में गेस्‍ट लेक्‍चरर हैं…

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं.)