Manual Scavenging

sewage tank death case Bhopal municipal corporation submitted report Case will registered

भोपाल: सीवेज टैंक में उतरने से 2 की मौत मामले में दर्ज होगा केस, मिलेगा 10 लाख का मुआवजा

भोपाल: मध्‍यप्रदेश की राजधानी भोपाल (Bhopal) के लाऊखेड़ी (Lau Khedi) में सीवेज चैंबर में उतरने से हुई दो लोगों की मौत के मामले में भोपाल नगर निगम (Bhopal Municipal Corporation) ने आनी जांच रिपोर्ट सौंप दी. इसमें माना गया है कि इंजीनियर और मजदूर बिना किसी सुरक्षा उपकरणों और सुरक्षा मानकों के सीवेज में उतरे थे. जांच रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कंपनी अंकिता कंस्ट्रक्शन की ओर से सुरक्षा के उपकरण नहीं दिए गए थे.

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, Bhopal Municipal Corporation ने अपनी रिपोर्ट में प्रशासन ने ये भी माना कि सीवर में जिस मृतक श्रमिक की मौत हुई, वह नाबालिग था. इस रिपोर्ट के बाद नगरीय प्रशासन मंत्री भूपेंद्र सिंह ने पुलिस कमिश्नर को क्रिमिनल केस दर्ज करने के निर्देश दिए हैं. साथ ही मृतकों के आश्रितों को 10-10 लाख रुपए की सरकारी मदद के आदेश देने का भी आदेश दिया गया है.

भोपाल : बिना सुरक्षा उपकरण सीवर टैंक में उतरे दो लोगों की मौत, अफसर बनना चाहता था मृतक युवक

मध्‍यप्रदेश (Madhya Pradesh) की राजधानी में भोपाल (Bhopal) में 20 फीट गहरे सीवर की सफाई के दौरान दो लोग हादसे का शिकार हो गए. गुजरात की एक कंपनी के इंजीनियर दीपक सिंह और एक अन्य नाबालिग छात्र सीवर की जांच के ल‍िए उसमें उतरे थे, जिससे उनकी मौत (Two Sanitation workers died while cleaning the Sewer) हो गई. गंभीर बात यह है कि इस उनके पास सुरक्षा उपकरण भी नहीं थे, जबकि मनुअल स्‍केवेजिंग कानून (THE PROHIBITION OF EMPLOYMENT AS MANUAL SCAVENGERS AND THEIR REHABILITATION ACT, 2013) में इसका सख्‍त प्रावधान है कि बिना सुरक्षा एवं अन्‍य सहायक उपकरणों के किसी भी शख्‍स को गटर, सीवर आदि में उतारा नहीं जा सकता.

 

Bhopal Two Sanitation workers died while cleaning Sewer without security equipment

भोपाल : बिना सुरक्षा उपकरण सीवर टैंक में उतरे दो लोगों की मौत, अफसर बनना चाहता था मृतक युवक

पाल. मध्‍यप्रदेश (Madhya Pradesh) की राजधानी में भोपाल (Bhopal) में 20 फीट गहरे सीवर की सफाई के दौरान दो लोग हादसे का शिकार हो गए. गुजरात की एक कंपनी के इंजीनियर दीपक सिंह और एक अन्य नाबालिग छात्र सीवर की जांच के ल‍िए उसमें उतरे थे, जिससे उनकी मौत (Two Sanitation workers died while cleaning the Sewer) हो गई. गंभीर बात यह है कि इस उनके पास सुरक्षा उपकरण भी नहीं थे, जबकि मनुअल स्‍केवेजिंग कानून (THE PROHIBITION OF EMPLOYMENT AS MANUAL SCAVENGERS AND THEIR REHABILITATION ACT, 2013) में इसका सख्‍त प्रावधान है कि बिना सुरक्षा एवं अन्‍य सहायक उपकरणों के किसी भी शख्‍स को गटर, सीवर आदि में उतारा नहीं जा सकता.

सरकार सीवर, सेप्टिक टैंक में सफाई करते लोगों की ‘अमानवीय मौत’ का आंकड़ा क्‍यों छिपा रही है?

सीवर सफाई का काम गुजरात की एक प्राइवेट कंपनी करा रही थी
भोपाल नगर निगम (Bhopal Municipal Corporation) के अंतर्गत जोन नंबर-1 के लाऊखेड़ी में एक निजी कंपनी सीवेज (Sewer Cleaning) का काम कर रही है. सीवेज लाइन अभी बंद है, लेकिन उसमें बारिश और घरों से निकलने वाला गंदा पानी भर गया. सोमवार को कंपनी के इंजीनियर दीपक सिंह और एक अन्य छात्र भारत जांच करने के लिए गए थे. ये दोनों काफी समय बाद तक बाहर नहीं निकले. इसके बाद उनकी तलाश शुरू की गई.

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दोपहर बाद मिले दोनों सफाई कर्मियों के शव
रिपोर्ट के मुताबिक, उनके काफी समय तक बाहर नहीं निकलने पर प्राइवेट कंपनी के अधिकारियों ने आनन-फानन में उनकी तलाश शुरू करवाई. काफी मशक्कत के बाद दोपहर बाद दोनों के शव निकाले गए. इस दौरान मौके पर इन दोनों लोगों के पास न तो कोई सफाई उपकरण थे और न ही उनके पास सुरक्षा के कोई उपकरण मौजूद थे.

दम घुटने की वजह से हुई मौत
रिपोर्ट कहती है कि दोनों जब बिना सुरक्षा उपकरण सीवर में उतरे थे, तो इतने गहरे सीवर में उतरने की वजह से दोनों को ऑक्सीजन की कमी हुई, जिससे उनका दम घुटने लगा और दोनों की मौत हो गई.

इंजीनियर के साथ जिस नाबालिग की मौत हुई वह अफसर बनना चाहता था. वह झाबुआ से कुछ किताबें खरीदने पिता के पास भोपाल आया. पिता पर आर्थिक बोझ ना पड़े, इसके लिए वो 13 दिसंबर को चैंबर के काम के लिए चला गया. वीडियो में रोते बिलखते पिता शैतान सिंह सिर्फ इतना कह पाए काम कर रहे थे. इस कंपनी में खाना खाकर सुपरवाइजर उसे लेकर गया.

देखें इस घटना का वीडियो…

जिम्मेदार अधिकारियों नहीं दिया कोई जवाब
हालांकि इस मामले में अभी तक भोपाल नगर निगम (Bhopal Municipal Corporation) का कोई बयान सामने नहीं आया है. संबंधित अधिकारी इस घटना में कोई भी जवाब देने के साथ अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहे हैं.

 

मंजीत नौटियाल प्रधानमंत्री से बोले, ये लाशें देख‍िए…
भीम आर्मी के राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष मंजीत सिंह नौटियाल ने इस घटना पर नाराजगी जाहिर करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल किए हैं. उन्‍होंने ट्विटर पर लिखा, पहले गटर में मारना दूसरी तरफ साथ में खाना. मोदी जी हमारे साथ खाना खाने से अच्छा आप हमारे सफाई कर्मचारियों को गटर में मरने से बचा लीजिये, ये काफी हैं. मध्यप्रदेश के भोपाल में सेफ्टी गियर्स के ना होने के चलते गटर में उतरने वाले 2 कर्मचारियों की मौत हो गई. यह लाशें @narendramodi देखो.

(Manual Scavenging) 

सफाई कर्मचारियों के हकों के लिए अदालत जाने वाले वकील अमित साहनी ने जताई नाराजगी
भोपाल में हुई इस घटना को लेकर वकील एवं सामाजिक कार्यकर्ता अमित साहनी ने रोष जाहिर किया है. उन्‍होंने कहा कि इस धरती पर मैनुअल स्‍केवेजिंग से बड़ा मानवाधिकार का कोई उल्‍लंघन नहीं. भारत में जब मैला ढोने की प्रथा को अमानवीय करार देकर बंद किया गया, तो वो एक सराहनीय कदम था. इसके बाद भी दूरदराज के क्षेत्रों में यह प्रथा आज भी जारी है. किसी इंसान का मल में उतरकर मल की सफाई करने के इस काम के ज्‍यादा अमानवीय और मानवाधिकार का उल्‍लंघन करने का कृत्‍य कुछ और नहीं हो सकता. यह प्रथा आज भी भारतीय समाज पर कलंक है, जिसे आजादी के बाद भी खत्‍म नहीं किया जा सका. केंद्र, राज्‍य सरकारें और उनके संबंधित प्राधिकरण आज भी सफाई कर्मचारियों के हितों को लेकर आंखें मूंदे हुए हैं और कानूनी प्रावधानों के बावजूद बिना सुरक्षा और अन्‍य उपकरणों के सफाई कर्मचारियों को सीवर, नालों, गटर आदि में सफाई करने के लिए उतारा जाता है, जिससे दम घुटने और अन्‍य कारणों से उनकी मौत तक हो जाती है.

बता दें कि एडवोकेट अमित साहनी ने सीवर और सेप्टिक टैंकों की हाथ से सफाई करने के कारण होने वाली मौतों को रोकने के लिए Manual Scavengers and their Rehabilitation Act, 2013 का सख्त अनुपालन सुनिश्चित करने की मांग को लेकर दिल्‍ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. उन्‍होंने हाईकोर्ट में दायर आवेदन में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले (Ramdas Athawale) के राज्यसभा में दिए उस बयान का जिक्र किया गया था कि पिछले पांच साल में ‘‘मैनुअल स्कैवेंजिंग (Manual Scavenging) के कारण किसी की भी मौत नहीं हुई.’’ एप्‍लीकेशन में दावा किया गया है कि केंद्रीय राज्यमंत्री द्वारा संसद के ऊपरी सदन में दिया गया बयान ‘‘न केवल झूठा और गुमराह करने वाला है बल्कि यह हाथ से मैला ढोने के कारण जान गंवाने वाले लोगों, उनके परिवारों और अब भी यह काम कर रहे लोगों के प्रति असंवेदनशीलता और उदासीनता को दिखाता है.’’ आवेदन में आगे कहा गया है कि संबंधित मंत्रालय ने इस साल फरवरी में कहा था कि “पिछले पांच वर्षों के दौरान मैनुअल स्कैवेंजर्स के कारण 340 मौतें हुई हैं” जो उच्च सदन में मंत्री द्वारा दिए गए जवाब के विपरीत है.

हाईकोर्ट में (5 अगस्‍त 2021) को मामले की सुनवाई थी. हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने मामले की सुनवाई करते हुए एप्‍लीकेशन में उठाई गई मांग को स्‍वीकार कर लिया और केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय को मामले में पार्टी बनाने के आदेश दिए. साथ ही अदालत ने इस एप्‍लीकेशन पर भारत सरकार को 13 सितंबर 2021 तक अपना जवाब दाखिल करने को कहा था. हालांकि अगली सुनवाई में अदालत में सरकार की तरफ से जवाब दायर अपना पल्‍ला झाड़ लिया गया.

Delhi High Court make Ministry of Social Justice and Empowerment as party in manual scavenging law strict application

दिल्‍ली हाईकोर्ट ने उठाया देशभर के सफाईकर्मियों से जुड़ा अहम कदम, सरकार को केस में बनाया पार्टी

नई दिल्‍ली : देशभर के सफाईकर्मियों (Sanitation Workers) से जुड़ा एक अहम कदम गुरुवार को दिल्‍ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने अपनी एक सुनवाई में उठाया. केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले द्वारा 28 जुलाई को राज्यसभा में दिए गए जवाब, जिसमें कहा गया कि बीते 5 वर्षों में मैनुअल स्कैवेंजिंग (Manual Scavenging) से कोई मौत का मामला सामने नहीं आया है, को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) में दायर एप्‍लीकेशन को न्‍यायालय ने स्‍वीकार कर लिया. इस आवेदन में भारत सरकार को भी पक्ष बनाए जाने की मांग की गई थी. दरअसल, मंत्री के बयान के बाद एडवोकेट एवं सोशल एक्टिविस्ट अमित साहनी द्वारा 2019 की एक पेंडिंग याचिका में यह एप्लीकेशन दायर की गई थी.

हाईकोर्ट में आज (5 अगस्‍त 2021) को मामले की सुनवाई थी. हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने मामले की सुनवाई करते हुए एप्‍लीकेशन में उठाई गई मांग को स्‍वीकार कर लिया और केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय को मामले में पार्टी बनाने के आदेश दिए. साथ ही अदालत ने इस एप्‍लीकेशन पर भारत सरकार को 13 सितंबर 2021 तक अपना जवाब दाखिल करने को कहा है.

बता दें कि एडवोकेट अमित साहनी द्वारा इस एप्‍लीकेशन में सीवर और सेप्टिक टैंकों की हाथ से सफाई करने के कारण होने वाली मौतों को रोकने के लिए Manual Scavengers and their Rehabilitation Act, 2013 का सख्त अनुपालन सुनिश्चित करने की मांग की गई है.

पढ़ें : सरकार सीवर, सेप्टिक टैंक में सफाई करते लोगों की ‘अमानवीय मौत’ का आंकड़ा क्‍यों छिपा रही है?

इस आवेदन में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले (Ramdas Athawale) के राज्यसभा में हाल में दिए उस बयान का जिक्र किया गया है कि पिछले पांच साल में ‘‘मैनुअल स्कैवेंजिंग (Manual Scavenging) के कारण किसी की भी मौत नहीं हुई.’’

देखें वीडियो…

एप्‍लीकेशन में दावा किया गया है कि केंद्रीय राज्यमंत्री द्वारा संसद के ऊपरी सदन में दिया गया बयान ‘‘न केवल झूठा और गुमराह करने वाला है बल्कि यह हाथ से मैला ढोने के कारण जान गंवाने वाले लोगों, उनके परिवारों और अब भी यह काम कर रहे लोगों के प्रति असंवेदनशीलता और उदासीनता को दिखाता है.’’

इसमें कहा गया है कि “भारत सरकार मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार के निषेध और उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013 की नीति बनाने और प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में इसके कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार है, जोकि भारत सरकार को इस याचिका के लिए एक आवश्यक पक्ष बनाता है.”

आवेदन में आगे कहा गया है कि संबंधित मंत्रालय ने इस साल फरवरी में कहा था कि “पिछले पांच वर्षों के दौरान मैनुअल स्कैवेंजर्स के कारण 340 मौतें हुई हैं” जो उच्च सदन में मंत्री द्वारा दिए गए जवाब के विपरीत है.

उच्च न्यायालय ने पहले दिल्ली सरकार के अलावा, नगर निकायों, दिल्ली जल बोर्ड, दिल्ली छावनी बोर्ड और लोक निर्माण विभाग से याचिका पर अपना हलफनामा दाखिल करने को कहा था.

अदालत ने टिप्पणी की थी कि सरकार चुनावी विज्ञापनों पर इतना पैसा खर्च करती है और उसे मैनुअल स्कैवेंजिंग के बारे में लोगों को जागरूक करने पर कुछ राशि खर्च करनी चाहिए, क्योंकि हर साल इस कारण लोग मारे जाते हैं.

Manual scavenging dalit awaaz 1

सरकार सीवर, सेप्टिक टैंक में सफाई करते लोगों की ‘अमानवीय मौत’ का आंकड़ा क्‍यों छिपा रही है?

बीते 28 जुलाई को उच्‍च सदन यानि राज्‍यसभा में मोदी सरकार सीवर, सेप्टिक टैंकों में सफाई करने (Manual Scavenging) के दौरान अमानवीय तरीके से हुई मौतों के आंकड़े को ‘बड़ी सफाई से छिपा’ गई. केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता (राज्य मंत्री) रामदास आठवले (Ramdas Athawale), जोकि खुद पिछड़ों/वंचितों के हक़ों के लिए राजनीति करने की बात करते हैं, साफ तौर पर कह गए कि बीते 5 साल में मैनुअल स्कैवेंजिंग (यानि हाथ से सीवर, नालों, सेप्टिक टैंकों की सफ़ाई करते हुए) के दौरान किसी भी सफ़ाईकर्मी की मौत नहीं हुई है. उन्‍होंने मल्लिकार्जुन खड़गे और एल हनुमंतैया की ओर से पूछे गए एक सवाल जवाब में यह बात आधिकारिक तौर पर कही.

लेकिन सबसे अचरज की बात ये है कि रामदास आठवले आखिर इन आंकड़ों को क्‍यों छिपा गए? क्‍योंकि इसी साल फरवरी में बजट सत्र के दौरान लोकसभा में एक लिखित जवाब में उन्‍होंने ही खुद बताया था कि बीते 5 साल में सेप्टिक टैंक और सीवर की साफ़ करने के दौरान 340 लोगों की मौत हुई. यह डाटा 31 दिसंबर, 2020 तक का था.

एक चौंकाने वाली बात यह भी है कि सरकार की ही संस्था राष्ट्रीय सफ़ाई कर्मचारी आयोग (National Commission for Safai Karamchari) की साल 2020 की रिपोर्ट में कहा गया कि वर्ष 2010 से लेकर मार्च 2020 तक यानी 10 साल के भीतर 631 लोगों की मौत सेप्टिक टैंक और सीवर साफ़ करने के दौरान हुई.

लेकिन अब सरकार बड़ी आसानी से यह कह रही है कि बीते 5 सालों में मैनुअल स्कैवेंजिंग (Manual Scavenging) के कारण एक भी मौत नहीं हुई है. अब सवाल ये उठता है कि आखिर मोदी सरकार इस बेहद गंभीर मुद्दे पर आंकड़ें क्‍यों छिपा रही है, जबकि उसकी ओर से सफाई कर्मचारियों के उत्‍थान और स्‍वच्‍छ भारत अभियान (Swacch Bharat Abhiyan) को लेकर बड़ी बातें की गई हैं.

No Death Due to Manual Scavenging ramdas athawale reply on rajya sabha
रामदास अठावले का राज्‍यसभा में दिया गया जवाब, जिसमें साफ तौर पर वह कह गए कि बीते 5 साल में मैनुअल स्कैवेंजिंग (यानि हाथ से सीवर, नालों, सेप्टिक टैंकों की सफ़ाई करते हुए) के दौरान किसी भी सफ़ाईकर्मी की मौत नहीं हुई है.

दरअसल, आसानी से नकार दिए जाने वाले इस मुद्दे की गंभीरता का अंदाजा कभी मानवीय तौर पर लगाया ही नहीं गया. पहले इसे कानूनी रूप से हमें समझना होगा. साल 2013 में मैनुअल स्‍कैवेंजिंग नियोजन प्रतिषेध और पुनर्वास अधिनियम लाया गया. इस तरह सरकार ने ‘मैनुअल स्केवेंजर’ की परिभाषा तय की, जिसमें कहा गया कि “ऐसा व्यक्ति जिससे स्थानीय प्राधिकरी हाथों से मैला ढुलवाए, साफ़ कराए, ऐसी खुली नालियां या गड्ढे जिसमें किसी भी तरह से इंसानों का मल-मूत्र इकट्ठा होता हो, उसे हाथों से साफ़ कराए तो वो शख़्स ‘मैनुअल स्केवेंजर’ कहलाएगा.”

The Prohibition of Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation Act, 2013 के तीसरे अध्याय का 7वां बिंदु कहता है कि इसके लागू होने के बाद कोई भी स्थानीय अधिकारी या कोई अन्य व्यक्ति किसी भी शख्‍स को सेप्टिक टैंक या सीवर में ‘जोख़िम भरी सफ़ाई’ करने का काम नहीं दे सकता. इस अधिनियम में विशेष तौर पर सेप्टिक टैंक और सीवर के संदर्भ में ‘जोख़िम भरी सफ़ाई’ को परिभाषित किया गया है.

इसे आसान तरीके से समझें तो इसका मतलब है सभी स्थानीय प्राधिकरणों को हाथ से मैला उठाने की व्यवस्था खत्‍म करने के लिए सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफ़ाई हेतु आधुनिक तकनीकों को अपनाना होगा. कोई भी ठेकेदार या प्राधिकरण सेप्टिक टैंक और सीवर साफ कराने के लिए बिना सुरक्षा गियर दिए सफ़ाईकर्मी से सफ़ाई नहीं करा सकता. यह पूरी तरह से प्रतिबंधित है.

हालां‍कि कड़वा सच यही है कि सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई करने के लिए अधिकतर सफाईकर्मियों को सीवर, सेप्टिक टैंकों या नालों के भीतर उतरना ही पड़ता है.

अच्‍छा एक और आंकड़ा देखिए… राज्यसभा में एक सवाल के जवाब के दौरान ही सामाजिक न्याय मंत्रालय ने बताया कि देश में मौजूदा वक्‍त में 66000 से अधिक सफाईकर्मी हैं, जो हाथों से ये जोखिम भरा काम करते हैं.

साल 2019 में नीति आयोग की एक रिपोर्ट आई. यह रिपोर्ट कहती है कि साल 2013 में जब मैनुअल स्केवेंजिंग (Manual Scavenging) रोकने के लिए कानून को लाया गया तो उस वक्त देश में 14000 से ज्‍यादा ऐसे सफाईकर्मियों को मैनुअल स्केवेंजर (Manual Scavengers) की श्रेणी में रखा गया. साल 2018 के सर्वे में ये संख्या बढ़ी, जोकि 39000 हो गई. साल 2019 में यह बढ़कर 54000 के पार हो गई और अब यह आंकड़ा 66000 से अधिक है.

इस वक्त यह जोखिम भरा काम करने वालों की तादाद उत्तर प्रदेश में सबसे ज्‍यादा 37 हज़ार के पार है. महाराष्‍ट्र में यह 7300 है और यह राज्‍य दूसरे स्‍थान पर है. सरकारी आंकड़ें कहते हैं कि छत्तीसगढ़ इस सूची में सबसे निचले पायदान पर है, जहां केवल तीन लोग ही यह काम करते हैं.

सफाई कर्मचारियों के प्रति सरकारों के इसी उदासीन एवं लापरवाह रवैये की वजह से हर साल ना जानें कितनी मौतें हो रही हैं. गंभीरता से इस विषय की ओर ध्‍यान ही नहीं दिया रहा. केवल कागजी तौर पर ही काम किया जा रहा है.

केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले के बयान के बाद इस मुद्दे को अदालत के दरवाजे तक ले जाना हमारी जिम्‍मेदारी बनती है, जिसके चलते हमने दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) में एक एप्‍लीकेशन दायर कर भारत सरकार को भी पक्ष बनाए जाने की मांग की है. इस बाबत हाईकोर्ट में पहले से 2019 की हमारी एक याचिका पेंडिंग है, जिसमें मंत्री के बयान के बाद इस एप्लीकेशन को दायर किया गया है. माननीय दिल्‍ली हाईकोर्ट इस पर 5 अगस्‍त को सुनवाई करेगा.

इस एप्‍लीकेशन में हमने सीवर और सेप्टिक टैंकों की हाथ से सफाई करने के कारण होने वाली मौतों को रोकने के लिए Manual Scavengers and their Rehabilitation Act, 2013 का सख्त अनुपालन सुनिश्चित करने की मांग की है. इस आवेदन में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले (Ramdas Athawale) के राज्यसभा में हाल में दिए उस बयान का जिक्र किया गया है कि पिछले पांच साल में ‘‘मैनुअल स्कैवेंजिंग (Manual Scavenging) के कारण किसी की भी मौत नहीं हुई.’’

एप्‍लीकेशन में हमने कहा है कि केंद्रीय राज्यमंत्री द्वारा संसद के ऊपरी सदन में दिया गया बयान ‘‘न केवल झूठा और गुमराह करने वाला है बल्कि यह हाथ से मैला ढोने के कारण जान गंवाने वाले लोगों, उनके परिवारों और अब भी यह काम कर रहे लोगों के प्रति असंवेदनशीलता और उदासीनता को दिखाता है.’’

साथ ही इसमें कहा है कि “भारत सरकार मैनुअल स्कैवेंजर्स (Manual Scavengers) के रूप में रोजगार के निषेध और उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013 की नीति बनाने और प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में इसके कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार है, जोकि भारत सरकार को इस याचिका के लिए एक आवश्यक पक्ष बनाता है.”

आवेदन में हमने आगे कहा है कि संबंधित मंत्रालय ने इस साल फरवरी में कहा था कि “पिछले पांच वर्षों के दौरान मैनुअल स्कैवेंजिंग (Manual Scavenging) की 340 मौतें हुई हैं” जो उच्च सदन में मंत्री द्वारा दिए गए जवाब के विपरीत है.

Advocate Amit Sahni Writer

(अमित साहनी, वकील एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो जनहित मुद्दों, दलितों एवं वंचित वर्ग के कानूनी अधिकारों को लेकर सक्रिय हैं और दिल्ली उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में दर्जनों जनहित याचिकाएं डाल उनके हक़ की लड़ाई लड़ रहे है. वह अक्‍सर सामाजिक मुद्दों पर लेख लिखते हैं.)

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