एडवोकेट रजत कलसन

technical flaws of SC ST Act

SC/ST Act की वो तकनीकी खामियां, जिनसे दलितों पर अत्‍याचार करने वाले बच जाते हैं…

अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार अधिनियम 1989 (Scheduled Caste and Scheduled Tribe (Prevention of Atrocities) Act, 1989) को भारत के संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत ‘अस्पृश्यता के अंत’ की अवधारणा के तहत 1989 में अधिनियमित किया गया था. संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता के अंत को कानून का रूप मिलने व इसके बाद सिविल राइट्स एक्ट (Civil Rights Act) के अस्तित्व में आने के बावजूद अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) व अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) समुदाय के खिलाफ जाति आधारित अपराध, अत्याचार तथा उनका आर्थिक व सामाजिक शोषण नहीं रूक पाया, जिसके चलते भारत की संसद को 1989 में एक नया सख्त कानून अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार अधिनियम बनाना पड़ा. हालां‍कि अगर इस कानून को देखा जाए तो यह कानून देखने में बेहद मजबूत नजर आता है तथा इसमें समय-समय पर संशोधन करके इसको और भी मजबूत बनाया गया है, लेकिन इसके बावजूद भी इसमें कुछ इस तरह की तकनीकी खामियां या कमियां हैं, जिसका फायदा अक्सर अनुसूचित जाति व जनजाति पर अत्याचार करने वाले लोग उठा जाते हैं.

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अब सीधा मुद्दे पर आते हैं. अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार अधिनियम में कुछ कानूनी शब्दों की परिभाषा दी गई है, परंतु इसमें कहीं भी शब्द पब्लिक व्यू यानी सार्वजनिक दृश्यता व पब्लिक प्लेस यानी सार्वजनिक स्थान की परिभाषा नहीं दी गई है.

अनुसूचित जाति व जनजाति समुदाय के किसी सदस्य को अपमानित करने का सबसे आसान तरीका है कि उसे जातिसूचक शब्दों या जाति के आधार पर दी जाने वाली गालियों से उसे संबोधित किया जाए. आमतौर पर शरीर के विरुद्ध किए गए अपराध व्यक्ति को शारीरिक तौर पर नुकसान पहुंचाते हैं, परंतु जातिसूचक गालियां बकने जैसे अपराध दलित समुदाय (Dalit Community) के लोगों की आत्मा को घाव पहुंचाते हैं तथा उसे एहसास दिलाते हैं कि वह आखिर इस समुदाय में पैदा ही क्यों हुआ तथा उसके मन में हजारों सवाल होने लगते हैं कि आखिर उसके साथ ऐसा बर्ताव क्यों किया जा रहा है?

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हम अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार अधिनियम 1989 की बात करें तो उसकी धारा 3(1)(r) व 3(1)(s) में कहा गया है कि यदि गैर अनुसूचित जाति समुदाय का कोई व्यक्ति यदि अनुसूचित जाति समुदाय के व्यक्ति को अपमानित करने की नियत से जातिसूचक गालियां देता है तो वह अपराध है, बशर्ते वह जातिसूचक गालियां सार्वजनिक दृश्यता (Public view) में व (Public Place) सार्वजनिक स्थान पर दी गई हों, यानी वह जगह सार्वजनिक स्थान होना चाहिए तथा वहां पर कुछ लोग इस घटना को देखने के लिए भी मौजूद होने चाहिए. अगर इस बात को दूसरे तरीके से कहें तो अगर किसी गैर अनुसूचित जाति समुदाय के व्यक्ति ने आपको किसी बंद कमरे में, या टेलीफोन पर या किसी गैर सार्वजनिक जगह या जनता की अनुपस्थिति में जातिसूचक गालियां दी हैं तो वह अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध नहीं है.

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अगर हम भारतीय अपराध कानून को पढ़ें तो भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) में साफ कहा गया है कि किसी अपराध को कारित होने के लिए सबसे पहले उस अपराध को करने की मंशा होने चाहिए, फिर अपराध करने की तैयारी तथा फिर अपराध करने का प्रयास होता है, लेकिन एससी/एसटी एक्ट (SC/ST Act) की धारा में 3(1)(r) भारतीय आपराधिक कानून की मूल अवधारणा को एक तरह से नहीं माना गया है. अगर अपराधी की नियत या मंशा दलित समाज (Dalit Community) के व्यक्ति को जातिसूचक गालियां देकर उसे अपमानित करने की हो, लेकिन उसकी गालियों को सुनने के लिए कोई और व्यक्ति या गवाह मौजूद ना हो या जगह सार्वजनिक ना हो तो एससी/एसटी एक्ट के तहत यह अपराध नहीं माना जाएगा, लेकिन अगर भारतीय आपराधिक कानून की मूल अवधारणा की बात करें तो अगर जातिसूचक गालियां जानबूझकर दलित व्यक्ति को अपमानित करने की नियत या मंशा से दी गई है तो वह निश्चित रूप से एक अपराध है.

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रोजाना अदालतों में देखा जा रहा है अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार अधिनियम के तहत दर्ज अपराधों में अपराधी इस कानून की इसी कमी का फायदा उठाकर जमानत प्राप्त कर लेते हैं. तब बाद में इस तकनीकी खामी के चलते बरी भी हो जाते हैं जोकि दलित समुदाय के लिए न्याय नहीं पूर्णता अन्याय है.

इसलिए अब समय आ गया है कि एससी/एसटी एक्ट में सार्वजनिक दृश्यता या पब्लिक व्यू को फिर से परिभाषित किया जाए तथा एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) व 3(1)(s) से पब्लिक व्यू यानी सार्वजनिक दृश्यता व पब्लिक प्लेस यानी सार्वजनिक स्थान शब्द को हटाया जाए तथा भारतीय आपराधिक कानून के तहत सार्वजनिक जगह की जगह अपराधी की मानसिकता या मंशा देखी जानी चाहिए.

(रजत कलसन जाने-माने वकील हैं एवं दलितों के कानूनी अधिकारों की लड़ाई लड़ते हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं.)

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जानिए कौन सी बातें हैं, SC/ST Act के तहत अपराध…

Advocate Rajat Kalsan
एडवोकेट रजत कल्‍सन

इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे कि अनुसूचित जाति व जनजाति समुदाय (Scheduled Caste & Scheduled Tribe Community) के खिलाफ कौन-कौन से काम करना अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार अधिनियम (SC/ST Act) के तहत गंभीर, गैर ज़मानती तथा नॉन कंपाउंडेबल अपराध है. अगर कोई गैर अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय का व्यक्ति इन कृत्‍यों को करता है तो उसे कुछ हफ्तों से लेकर महीनों तक जेल में काटने पड़ सकते हैं तथा साबित होने पर लंबे समय तक जेल की सजा काटनी पड़ सकती है.

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आइये जानें इनके बारे में…

1. किसी अनुसूचित जाति या जनजाति (SC/ST) समुदाय के व्यक्ति को कोई घृणित या अखाद्य या अपशिष्ट पदार्थ खाने या पीने के लिए मजबूर करें या जबरदस्ती उसके मुंह में डाले.

2. किसी अनुसूचित जाति/जनजाति समुदाय के व्यक्ति के घर, जमीन, प्‍लॉट या द्वार पर किसी इंसान मलमूत्र, किसी जानवर का मलमूत्र, किसी जानवर का शव या कोई अन्य घृणित पदार्थ डालना.

3. किसी अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति को जानबूझकर चोट मारने, नुकसान पहुंचाने, परेशान करने या अस्वस्थ करने की नीयत से उसके घर के सामने या पड़ोस में मलमूत्र डालना, किसी जानवर का शव डालना, कूड़ा करकट डालना या कोई अन्य घृणित पदार्थ डालना.

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4. किसी अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय (Scheduled Caste & Scheduled Tribe) के व्यक्ति के गले में चप्पल-जूतों का हार डालकर या उसे नग्न या अर्धनग्न हालत में सार्वजनिक स्थानों पर परेड कराना.

5. किसी अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति का उसके मानवाधिकारों के विरुद्ध जबरदस्ती उसे गंजा करना, उसकी दाढ़ी- मूंछें साफ करना, उसके कपड़े उतरवाना या उसके शरीर को रंगना या मुंह पर जबरदस्ती कालिख पोतना.

6. किसी अनुसूचित जाति समुदाय के व्यक्ति की मिल्कियत वाली या अलॉट की गई, ट्रांसफर की गई या उसके कब्जे वाली या सरकार द्वारा इसके हक में इस तरह की अधिसूचित जमीन पर कब्जा करने की कोशिश करना या जबरदस्ती उस पर खेती करना.

7. किसी अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति की मिल्कियत या कब्जे वाली जमीन से जबरदस्ती कब्जा छीनना या उस कब्जे के साथ जंगल से जुड़े हुए अधिकार तथा सिंचाई व पानी से जुड़े हुए अधिकारों से उसे वंचित करना व उसकी जमीन पर उगी फसल को नष्ट करना या लूटना.

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8. किसी अनुसूचित जाति व जनजाति समुदाय के व्यक्ति से जबरदस्ती बेगार या बंधुआ मजदूरी कराना.

9. किसी अनुसूचित जाति व जनजाति समुदाय के व्यक्ति से जबरदस्ती किसी मानव या जानवर का शव उठवाना या उस उद्देश्य के लिए कोई क़ब्र खोदने के लिए मजबूर करना.

10. अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति को मानव मल ढोने के लिए मजबूर करना या उसे इस तरह के किसी व्यवसाय या नौकरी करने के लिए मजबूर या प्रेरित करना.

11. किसी अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय की महिला या पुरुष को धार्मिक संस्थान, मंदिर या स्थान में किसी देवता, राक्षस, प्रतिमा या पूजा का पात्र बनने के लिए मजबूर करना व इस काम के लिए बढ़ावा देना या देवदासी जैसी प्रथा के लिए मजबूर करना या इस तरह की प्रथा को बढ़ावा देना.

12. चुनाव के समय कानून के विरुद्ध किसी अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति को किसी विशेष उम्मीदवार को वोट देने या न देने के लिए मजबूर करना तथा अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति को बतौर उम्मीदवार चुनाव लड़ने से रोकना या उसको अपनी उम्मीदवारी वापस लेने के लिए मजबूर करना या किसी उम्मीदवार का प्रस्तावक बनने से रोकना.

13. अनुसूचित जाति व जनजाति समुदाय का व्यक्ति जो संविधान के तहत किसी पंचायत या पंचायत समिति या अन्य किसी पंचायत निकाय में किसी पद पर है उसे उसकी कानूनी व संवैधानिक ड्यूटी करने से रोकना या संविधान विरुद्ध कार्य करने के लिए मजबूर करना या धमकी देना.

14. चुनाव के बाद किसी अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति को चोट मारना, उस पर हमला करना या उसे गंभीर चोटें मारना या उसका या उसके समुदाय का जान-बूझकर सामाजिक बहिष्कार करना करके उसे सामाजिक सुविधाओं का फायदा लेने से रोकना.

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15. चुनाव के दौरान किसी अनुसूचित जाति समुदाय के व्यक्ति को किसी विशेष उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने या ना डालने के लिए इस कानून के तहत अपराध करना.

16. किसी अनुसूचित जाति व जनजाति समुदाय के व्यक्ति खिलाफ झूठी दुर्भावनापूर्ण तथा कष्टकर कानूनी व आपराधिक कार्रवाई करना.

17. अनुसूचित जाति व जनजाति के व्यक्ति के विरुद्ध किसी लोकसेवक का झूठी व दुर्भावनापूर्ण शिकायत करना, ताकि लोकसेवक अपनी शक्तियों का प्रयोग अनुसूचित जाति व जनजाति समुदाय के व्यक्ति को परेशान करने या उसे कष्ट पहुंचाने में करे.

18. अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति का अपमान करने या उसे नीचा दिखाने के नियत से किसी सार्वजनिक स्थान पर जनता की मौजूदगी में उसका अपमान करना.

19. किसी सार्वजनिक स्थान पर किसी अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति का अपमान करने की नियत से या उसे नीचा दिखाने के लिए उसे जातिसूचक गालियां बकना.

20. किसी ऐसी वस्तु या प्रतिमा जो दलित समाज के लिए में उच्च सम्मान व पवित्रता रखती हो उसे तोड़ना, नष्ट करना या अशुभ करना.

21. अनुसूचित जाति जनजाति समुदाय के प्रति मौखिक, लिखे हुए शब्दों द्वारा या इशारों या किसी विरोध पत्र द्वारा दुश्मनी की भावना, नफरत, वैरभाव को बढ़ावा देना या बढ़ाने का प्रयास करना.

22.अनुसूचित जाति जनजाति समुदाय के महान पुरुषों, संतों प्रति मौखिक, लिखे हुए शब्दों या इशारों का किसी विरोध पत्र द्वारा उनका अपमान या अनादर करना या करने का प्रयास करना.

23. यह जानते हुए कि यह महिला अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय से है उसे किसी यौन हिंसा/ छेड़खानी करने की नियत उक्त महिला की मर्जी के बगैर से छूना.

24. यह जानते हुए कि महिला या युवती अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय से है, उसकी तरफ जानबूझकर यौन हिंसा या छेड़खानी की नियत से भद्दे इशारे करना, फब्तियां कसना या अश्लील हरकतें करना.

25. आमतौर पर किसी अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले जलाशय या पानी के स्त्रोत को जानबूझकर उक्त व्यक्ति या समुदाय के लोगों को परेशान करने के लिए दूषित करना, रोकना या अशुद्ध करना.

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26. अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति को किसी परंपरागत रास्ते का इस्तेमाल कर किसी अड्डे, रिसोर्ट जाने से रोकना या किसी सार्वजनिक स्थान का इस्तेमाल करने में रुकावट पैदा करना, जिनका इस्तेमाल करने का अनुसूचित जाति व जनजाति समुदाय के लोगों का हक हो.

27. अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय को या उसके किसी सदस्य को कोई गांव, घर या कोई अन्य स्थान छोड़ने के लिए मजबूर करना या इस तरह के हालात पैदा करना.

28. किसी अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय को किसी इलाके की सामुदायिक या सांझी प्रॉपर्टी इस्तेमाल करने से रोकना या किसी दफनाने की जगह या अंतिम संस्कार की जगह का प्रयोग करने से या दलित समाज को किसी सामुदायिक या सांझा जल स्त्रोत, जलाशय, पानी की डिग्गी, नाला, नदी, नलकूप या किसी पब्लिक सुविधा केंद्र, रास्ता, सड़क को इस्तेमाल करने से रोकना.

29. अनुसूचित जाति या जनजाति समाज के लोगों को साइकिल यात्रा करने से, मोटरसाइकिल पर जुलूस निकालने से या किसी शादी या शुभ अवसर पर या दुख के अवसर पर कोई जुलूस निकालने, शादी या किसी शुभ अवसर पर घोड़ी चढ़ने या किसी वाहन में बैठने से रोकना.

30. अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय की किसी व्यक्ति को किसी धार्मिक स्थान में घुसने से रोकने या किसी धार्मिक, सामाजिक या सांस्कृतिक समारोह या जुलूस में हिस्सा लेने या शामिल होने से रोकना.

31. अनुसूचित जाति/जनजाति समुदाय लोगों को किसी शिक्षण संस्थान, अस्पताल, डिस्पेंसरी, प्राथमिक चिकित्सा केंद्र, दुकान या पब्लिक एंटरप्राइजेज या किसी और सार्वजनिक स्थान पर घुसने या उसका प्रयोग करने से रोकना या किसी बर्तन या किसी वस्तु जो सामुदायिक इस्तेमाल के लिए किसी सार्वजनिक जगह पर रखी हुई है, उसका इस्तेमाल करने से रोकना.

32. अनुसूचित जाति समुदाय के लोगों को किसी व्यवसाय, धंधा करने जीविका चलाने, कोई बिजनेस करने या किसी जगह नौकरी करने से रोकना जहां पर अन्य समुदायों के लोग नौकरी करने का अधिकार रखते हैं.

33. जादू टोना या डायन प्रथा के नाम पर किसी अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति को चोट मारना, परेशान करना या उसे मानसिक पीड़ा पहुंचाना.

34. अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के किसी व्यक्ति, परिवार या समुदाय का सामाजिक व आर्थिक बहिष्कार करना या बहिष्कार करने की धमकी देना.

35. अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय के किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने की नियत से उसके खिलाफ मनगढ़ंत, झूठा सबूत यह जानते हुए कि झूठे सबूत या शिकायत की वजह से अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति को मौत तक की सजा हो सकती है को लोक सेवक के समक्ष प्रस्तुत करना और यदि इस तरह के झूठे व मनगढ़ंत सबूत के आधार पर किसी निर्दोष अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति को सजा हो जाती है तो ऐसा अपराधियों को मौत की सजा से दंडित किया जाएगा.

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36. अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय के किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने की नियत से उसके खिलाफ मनगढ़ंत, झूठा सबूत यह जानते हुए कि झूठे सबूत या शिकायत की वजह से अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति को सात साल या अधिक तक की सजा हो सकती है को लोक सेवक के समक्ष प्रस्तुत करना और यदि इस तरह के झूठे व मनगढ़ंत सबूत के आधार पर किसी निर्दोष अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति को सजा हो जाती है तो ऐसा अपराधियों को सात साल की सजा से दंडित किया जाएगा.

37. किसी दलित समुदाय के व्यक्ति के घर में कोई ज्वलनशील पदार्थ या विस्फोटक पदार्थ यह जानते हुए रखना कि इससे उस अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति की प्रॉपर्टी को नुकसान हो सकता है तो ऐसे अपराधी को कम से कम 6 महीने और अधिकतम 7 साल की सजा व जुर्माने से दंडित किया जाएगा.

38. अनुसूचित जाति व जनजाति समुदाय के व्यक्ति के घर में जानबूझकर आग लगाने या विस्फोट करने, यह जानते हुए कि जिस स्थान या प्रोपर्टी आग लगाई जा रही है वह इंसानों के रहने के लिए है या पूजा का स्थान है तथा दलित समुदाय के व्यक्ति के कब्जे में है अगर कोई गैर अनुसूचित जाति समुदाय का व्यक्ति यह अपराध करता है तो उसे कम से कम उम्र कैद व जुर्माने के साथ सजा सुनाई जाएगी.

39. यदि कोई गैर अनुसूचित जाति समुदाय का व्यक्ति किसी अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति को यह जानते हुए कि सामने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय से है, यह जानते हुए उसके साथ कोई ऐसा अपराध करता है, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धाराओं में कम से कम 10 साल की सजा हो सकती है उस दशा में एक्ट की धारा 3(2)(5) स्वयं आकर्षित हो जाएगी तथा इस धारा के तहत आरोपी को कम से कम उम्रकैद व जुर्माने की सजा सुनाई जाएगी.

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40. यदि कोई गैर अनुसूचित जाति समुदाय का व्यक्ति अनुसूचित जाति समुदाय के व्यक्ति या प्रोपर्टी को जानते हुए कि यह दलित समुदाय से संबंधित है, कोई ऐसा अपराध करता है जो भारतीय दंड संहिता के तहत भी अपराध है तो उस व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता के तहत अधिकतम सजा व जुर्माने से दंडित किया जाएगा.

41. यदि अनुसूचित जाति/जनजाति समुदाय के व्यक्ति खिलाफ कोई अपराध होने की जानकारी है या उस पर विश्वास करने का कारण है तथा कोई गैर अनुसूचित जाति समुदाय का व्यक्ति इससे संबंधित कोई सबूत को इस नियत से नष्ट करता है ताकि अपराधी को कानूनी सजा से बचाया जा सके या इस संबंध में कोई झूठी जानकारी लोक सेवक को देता है तो वह इस बारे में दंडित किया जाएगा.

42. यदि कोई आरोपी अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार अधिनियम के तहत कोई अपराध करता है तथा वह कोई लोकसेवक या कर्मचारी भी है तो उसे कम से कम 1 साल के कारावास या किये गए अपराध में दी गयी सजा को भुगतना होगा.

43. यदि कोई सरकारी अधिकारी जो गैर अनुसूचित जाति समुदाय से है जानबूझकर अपनी सरकारी ड्यूटी को अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय को नुकसान पहुंचाने के लिए लापरवाही से प्रयोग करता है तो उसे कम से कम 6 माह और जो 1 साल तक हो सकेगी व जुर्माने से दंडित किया जाएगा.

अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार अधिनियम के तहत वर्णित अपराध non-compoundable है. इन अपराधों में समझौता नहीं किया जा सकता तथा इन अपराधों में शिकायतकर्ता, पुलिस या ट्रायल कोर्ट को भी समझौता कराने का अधिकार नहीं है. यदि कोई शिकायतकर्ता अदालत के सामने गवाही के दौरान समझौते करने की नियत से अपने बयानों से मुकरता है तो सरकार को तथा अदालत को उस शिकायतकर्ता के खिलाफ कानून प्रक्रिया संहिता की धारा 340 व 195,193, 182 के तहत मुकदमा दर्ज कराने का अधिकार होगा, जिसमें उसे शिकायतकर्ता को सजा हो सकती है.

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एससी/एसटी एक्ट की 20 जरूरी बातें, जो आपको पता होनी चाहिए

Advocate Rajat Kalsan
एडवोकेट रजत कल्‍सन

1. एससी/एसटी एक्ट (SC/ST Act) अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) व जनजाति समुदाय के लोगों को छोड़कर बाकी सभी धर्मों व समुदायों के लोगों पर लागू होता है.

2. अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (Scheduled Caste and Scheduled Tribe (Prevention of Atrocities) Act) से संबंधित शिकायत पर केस दर्ज कराने के लिए सवर्ण समुदाय के गवाह का होना जरूरी नहीं है. यह मात्र एक अफवाह है.

3. अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार अधिनियम की धारा 3 में 42 तरह के अपराधों का विवरण है, अगर आपके साथ इनमें से कोई भी अपराध हुआ है तो आप एससी/एसटी एक्ट के तहत पुलिस में मुकदमा दर्ज कराने के हकदार हैं. अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों के साथ हो रहे अत्याचार के लगभग सभी तरीकों को इस एक्ट की धारा 3 में शामिल किया गया है.

4. अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार अधिनियम की धारा 18A के तहत पुलिस का आपकी शिकायत पर मुकदमा दर्ज करना जरूरी है तथा पुलिस को गिरफ्तारी के लिए किसी उच्चाधिकारी की परमिशन जरूरत नहीं पड़ेगी. इस अधिनियम के तहत अपराध करने वाले अपराधी को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत का लाभ नहीं मिलेगा. परंतु हाल में ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में आए एक फैसले में कहा है कि कुछ प्रथम दृष्टया ना बनने वाले मामलों में इस तरह की छूट दी जा सकती है.

5. एससी/एसटी एक्ट में शिकायत दर्ज कराने के लिए आपको अपने साथ हुई घटना का विवरण एक सफेद कागज पर लिखकर नजदीकी थाने के प्रभारी को देना होगा. उक्त थाना प्रभारी द्वारा कार्रवाई न किए जाने की सूरत में उसी शिकायत को रजिस्टर्ड डाक द्वारा जिले के डीसीपी या एसपी को भेजना होगा. उस स्थिति में भी कार्रवाई ना होने पर आप अपनी शिकायत को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग या अपने राज्य के अनुसूचित जाति आयोग को खुद या डाक द्वारा दे सकते हैं. इसके बाद भी आपकी शिकायत दर्ज नहीं होती है तो आप अपने जिले में अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार अधिनियम के तहत स्थापित विशेष अदालत में एक्ट के रूल 5 व धारा 14 के तहत एफआईआर दर्ज करने के लिए आवेदन दे सकते हैं.

6. यदि कोई किसी थाने का प्रभारी या जांच अधिकारी आपकी शिकायत पर मुकदमा दर्ज करने से मना करता है या जांच के दौरान किसी गैरअनुसूचित जाति के व्यक्ति को अनुचित लाभ पहुंचाता है या अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के व्यक्ति को अनुचित नुकसान पहुंचाता है तो एससी/एसटी एक्ट की धारा 4 व भारतीय दंड संहिता की धारा 166, 166A, 217 व 219 के तहत उस पर पुलिस विभाग या अदालत में कड़ी कार्रवाई की जा सकती है.

7. एससी /एसटी एक्ट के तहत सक्षम अदालत द्वारा किसी भी अपराधी को 6 माह से लेकर उम्रकैद/मृत्‍युदंड तक की सजा सुनाई जा सकती है व उस पर जुर्माना किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त जिस व्यक्ति को सजा हुई है, उस व्यक्ति की प्रॉपर्टी अदालत द्वारा जब्‍त करने का भी प्रावधान है. हालांकि सजा की अवधि अपराध की गंभीरता के ऊपर निर्भर करती है.

8. अगर अदालत अपनी खुद की जांच, या किसी शिकायत पर या पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर संतुष्ट हो जाती है कि कोई व्यक्ति जो गैर अनुसूचित जाति समुदाय से है उसके किसी विशेष इलाके में रहने से अनुसूचित जाति के तहत एक्ट के तहत बार-बार अपराध होने की संभावना है तो अदालत खुद की जांच, या किसी शिकायत पर या पुलिस रिपोर्ट के आधार पर उस व्यक्ति को अधिकतम 3 सालों के लिए उस इलाके से तड़ीपार घोषित कर सकती है.

8. एससी/एसटी एक्ट की धारा 14 के अनुसार अब अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई एक्ट की धारा 14 के तहत पूरे भारत में स्थापित विशेष अदालतों में ही होगी तथा इन अदालतों का संचालन अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश स्तर के अधिकारी करेंगे.

9. यह सरकार तथा राज्य की ड्यूटी होगी कि वे पीड़ितों की सुरक्षा के बारे में प्रबंध करें. पीड़ितों के परिजन तथा गवाहों को किसी भी तरह की धमकियां, उत्पीड़न या हिंसा से बचाने का प्रबंध करे.

10. अत्याचार पीड़ित के साथ किसी भी थाने या अदालत में पूरी तरह सम्मान व गरिमा के साथ व्यवहार किया जाएगा.

11. अगर सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट या अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार अधिनियम के तहत स्थापित विशेष अदालत में चल रहे मुकदमे में अपराधी के खिलाफ किसी भी याचिका, जमानत याचिका या किसी भी स्टेज की कोई सुनवाई हो रही है तो उस अदालत को उस निर्धारित सुनवाई की तिथि से पूर्व पीड़ित या उसके अधिवक्ता को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने के लिए अदालत में कानूनन मौका देना होगा.

12. यदि राज्य सरकार, पुलिस तथा प्रशासन अत्याचार पीड़ित की सुरक्षा, पुनर्वास या किसी अन्य मामले में सुनवाई नहीं कर रहा है तो एक्ट के तहत स्थापित स्पेशल कोर्ट सुरक्षा, पुनर्वास तथा अदालत तथा थानों में आने-जाने के खर्चों का भुगतान करने के लिए राज्य सरकार या पुलिस को आदेश जारी कर सकती है.

13. संबंधित थाना प्रभारी को पीड़ित की एफआईआर दर्ज कर उसे एफआईआर की कॉपी तुरंत मौके पर ही देनी होगी.

14. पीड़ित की एफआईआर दर्ज होने के बाद सरकार को एससी/एसटी एक्ट की कंपनसेशन स्कीम के तहत हर अपराध के तहत दी जाने वाली कंपनसेशन राशि उसे मुकदमे के दर्ज होने के तुरंत बाद उपलब्ध करवानी होगी.

15. हत्या, सामूहिक नरसंहार, सामूहिक हिंसा, यौन अपराध, सोशल बाईकॉट जैसे अपराधों में राज्य सरकार पुलिस प्रशासन को तुरंत पीड़ितों को भोजन, पानी, कपड़ा, चिकित्सा सुविधा, परिवहन ,रोजाना गुजारा भत्ता जैसी सुविधाएं तुरंत उपलब्ध करानी होगी.

16. जांच एजेंसी को पीड़ित द्वारा दर्ज कराए गए केस की जांच का स्टेटस, अदालती कार्रवाई का स्टेटस तथा अदालत में दायर की गई चार्जशीट की कॉपी की प्रति व उसका स्टेटस तुरंत पीड़ित को या उसके अधिवक्ता को बताना होगा.

17. जिला मजिस्ट्रेट या उपमंडल मजिस्ट्रेट अपने हद में आने वाले इलाके, अगर उसमें दलितों के साथ अत्याचार की घटनाएं ज्यादा हो रही हैं तो उस इलाके को अत्याचार प्रभावित क्षेत्र घोषित कर सकते हैं तथा वहां के गैरअनुसूचित जाति समुदाय के लोगों के खिलाफ उस इलाके में शांति तथा व्यवस्था बनाए रखने के लिए निवारक कार्यवाही कर सकते हैं.

18. राज्य सरकारें किसी इलाके को अत्याचार प्रभावित क्षेत्र घोषित करने के बाद उस इलाके में पीड़ित समुदाय की सुरक्षा के लिए वहां पर एससी/एसटी प्रोटेक्शन सेल का गठन कर सकेंगे.

19. राज्य सरकार या जिला प्रशासन को पीड़ित व्यक्ति या व्यक्तियों की सुरक्षा के लिए उन्हें राजकीय नियमों की पालना के बाद शस्त्र लाइसेंस उपलब्ध कराने होंगे.

20. अदालत में अत्याचार पीड़ितों को खुद के केस की पैरवी के लिए खुद की पसंद का वकील स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के तौर पर नामांकित करा सकेंगे. इसकी फीस राज्य सरकार को देनी होगी.

अगले लेख में आपको बताएंगे, इस एक्ट के तहत होने वाले अपराधों के विवरणों के बारे में…

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