डॉ. भीमराव आंबेडकर

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दलित मुक्ति के सवालों की तलाश और अंतरजातीय विवाह

अंग्रेजों से स्वतंत्रता पाने के लिए ‘आज़ादी’ एक विचार था और उस विचार पर कई सारे दृष्टिकोण एक साथ काम कर रहे थे. यदि हम बैठकर उन विचारों का अध्ययन करें तो देखते हैं कि कहीं न कहीं आज़ादी के कारणों में वह सब सम्मिलित हैं. दलित समाज (Dalit Samaj) हजारों वर्षों से गुलामी की दलदल में धसा पड़ा है. इसे इस दलदल से बाहर निकालने की कोशिश संयुक्त रूप में कभी नहीं की गई.

दलितों के लिए मध्यकालीन सन्तों, गुरुओं जैसे कबीर, गुरु नानक देव, रविदास आदि ने शब्द युद्ध लड़ा. समाज में फैली बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई, लेकिन यह लड़ाई प्रतीकात्मक बनी रही. सही मायनों में दलितों की ‘राजनैतिक चेतना’ ने ही दलित विषय की गम्भीरता को समझा, लेकिन दलितों के पास सच्चे नेता की कमी लम्बे समय से बनी हुई है.

दलित समाज में वर्तमान समय में सही नेतृत्व की कमी है. नए विचारों की कमी है. केवल जागरूकता के नाम पर साहित्यिक सेमिनारों का आयोजन पर्याप्त नहीं है. दलितों को संगठित होने की बात बाबा साहब डॉ. बीआर आंबेडकर कह गए हैं, क्योंकि दलितों का एकजुट होना ही इनकी जीत है. मौका परस्तों को, दलित नेतृत्व में आगे ना आने देना आज सबसे बड़ी जरूरत है.

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आज की लड़ाई जीतने के लिए दलितों को एक नए औज़ार की जरूरत है. एक ऐसे विचार की जरूरत है जो एक नया और ताकतवर हथियार खड़ा कर सके. जो दलितों को इस गुलाम मानसिकता से बाहर निकाल सकने में कामयाब हो सके.

एडवोकेट एस. एल विरदी, डॉ आंबेडकर (Dr. BR Ambedkar) के बताए रास्तों को दलित मुक्ति का रास्ता बताते है. अपने एक लेख में बाबा साहब की कही बातों को आसान शब्दों में समझाते हुए लिखतें हैं:

1. समाज में सभी व्यक्तियों को शिक्षा प्राप्ति और अपनी रुचि अनुसार रोजगार चुनने की आज़ादी होनी चाहिए.
2. समाज में तरक्की के लिए सभी के लिए समान अवसर और साधन उपलब्ध होने चाहिए.
3. समाज में यदि कोई व्यक्ति मुकाबले की दौड़ में किसी कारण से पीछे रह जाता है तो भी वह खुद से आगे निकलने वालों की घृणा का पात्र नहीं बनना चाहिए, बल्कि उसके साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार होना चाहिए.
4. समाज में किसी भी व्यक्ति को रोजगार परिवर्तन की आजादी होनी चाहिए. पैतृक कार्य के लिए वह बाध्य ना किया जाए.
5. समाजिक या धार्मिक आधार पर किसी के साथ भी भेदभाव नहीं होना चाहिए.
6. समाज में विवाह के लिए जन्म, जात, वर्ण की पाबंदी नहीं होनी चाहिए.

इन सभी बातों में सबसे महत्वपूर्ण जो आख़री नुक़्ता है, वह ही दलित मुक्ति का सबसे अहम उत्तर बन सकता है. अफसोस के आज देश डिजिटल होने की बात करता है, मगर हजारों वर्षों से चली आ रहे जातीय समीकरणों को बदलने के लिए झिझकता दिखाई देता है. पढ़-लिखकर नौकरी कर रहे बच्चों के दिमाग में जातिवाद का ज़हर धीरे-धीरे इंजेक्ट किया जाता है. यह बेहद दुखद है, पर सत्य है. समाजिक नियमों को बदलने का हमारे यहां अधिक चलन नहीं रहा है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जैसे एक जगह अधिक देर तक खड़े पानी में बदबू आने लगती है, बिल्कुल उसी तरह कुप्रथाएं भी वातावरण को दूषित करती हैं. उनका बदलाव ही जीवन की नियति है.

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जहां इस विषय को लेकर निराशा होती है, वहीं सकारात्मक व सही सोच वाले समझदार लोग भी समाज के हर वर्ग में पाए जाते हैं. उनसे प्रेरणा पाकर ही जातिवाद में समय- समय पर सेंध लगती रही है. अनेक युवा माता-पिता के खिलाफ जाकर भी विवाह करते हैं, जहां कई बार बाद में आशीर्वाद दे दिया जाता है और कई बार ऑनर किलिंग की सूली चढ़ा दिया जाता है.

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सही मायनों में समाजिक धारणाओं को बदलने के लिए पढ़े-लिखे युवाओं का संगठित होना और विवाह की नवीन पंरपरा आरंभ करना ही दलित मुक्ति का सफल क़दम होगा.

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लेखक बलविंदर कौर नन्दनी दलित साहित्य पर शोधकर्ता (दिल्ली विश्वविद्यालय) व स्वतंत्र पत्रकार हैं…

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं.)

 

Dr. Ambedkar On Dalit Education

जब डॉ. आंबेडकर ने कहा, शिक्षा में पिछड़े वर्ग की स्थिति मुसलमानों से भी बुरी है

डॉ. भीमराव आंबेडकर (Dr. BR Ambedkar) ने विभिन्‍न संप्रदायों के शैक्षणिक विकास में तुलनात्‍मक असमानता पर आंकड़े रखते हुए नाराज़गी प्रस्‍तुत की थी. 12 मार्च 1927 में मुंबई प्रांत विधान परिषद में दिए अपने भाषण में कहा था, देश में शिक्षा में मामले में पिछड़े वर्ग (Backward Classes) की स्थिति मुसलमानों (Muslims) की स्थिति से भी बुरी है. बाबा साहब ने तत्‍कालीन शिक्षा मंत्री के सामने बाकायदा गणना प्रस्‍तुत करते हुए यह बात कही थी.

बाबा साहब ने कहा था कि आंकड़ों पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि प्राथमिक शालाओं में प्रवेश करने वाले प्रति सैंकड़ा बच्‍चों में से मात्र 18 ही चौथी कक्षा तक पहुंचते हैं, इसलिए मैं माननीय शिक्षा मंत्री से अनुरोध करता हूं कि प्राथमिक शिक्षा की मद पर और ज्‍यादा पैसा खर्च किया जाए.

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डॉ.आंबेडकर ने मुंबई प्रांत विधान परिषद में कहा कि यह देश विभिन्‍न संप्रदायों से मिलकर बना है. ये सभी समुदाय अपनी स्थिति और प्र‍गति में एक दूसरे से अलग हैं. अगर उन्‍हें बराबरी के स्‍तर पर लाए जाने की बात है तो इसका एक ही उपाय है. समानता का सिद्धांत अपनाना और जिनका स्‍तर निम्‍न है, उनके साथ विशेष व्‍यवहार करना. लेकिन मैं कहता हूं कि सरकार ने इस सिद्धांत को मुस्लिमों पर अच्‍छी तरह से अपनाया है. मेरी एकमात्र शिकायत यही है कि सरकार ने इस सिद्धांत को पिछड़े वर्ग में प्रयोग किया जाना उचित नहीं समझा है. इसलिए मैं समझता हूं कि इस मामले में विशेष व्‍यवहार का सिद्धांत अपनाया जाना चाहिए.

बाबा साहब ने कहा कि जैसा कि मैंने स्‍पष्‍ट किया है कि उनकी स्थिति मुसलमानों से भी बुरी है और मेरी यह दलील है कि यदि ऐसे लोगों के साथ विशेष व्‍यवहार किया जाता है, जो इसके लायक हैं, जिन्‍हें इसकी जरूरत है, तो पिछड़े वर्गों पर मुसलमान की अपेक्षा ज्‍यादा ध्‍यान दिए जाने की जरूरत है.

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Dr. BR Ambedkar Education Qualification and Degrees

Dr. BR Ambedkar Education Qualification and Degrees : डॉ. आंबेडकर के पास कौन-कौन सी डिग्रियां थीं…

भारत में अछूतों (दलितों) (Dalits) के खिलाफ सामाजिक भेदभाव ने डॉ. बीआर आंबेडकर (Dr. BR Ambedkar Education Qualification and Degrees) के जीवन पर बचपन से ही गहरी छाप छोड़ी. उच्‍च जातियों द्वारा अछूतों (दलितों को) इंसान न समझा जाना, उन्‍हें बेहद सालता था. उन्‍होंने बचपन में तय कर लिया था कि वह दलितों के प्रति इस सामाजिक भेदभाव को खत्‍म करने के विरुद्ध सार्थक अभियान चलाएंगे और उन्‍हें उनका हक दिलाएंगे, लेकिन इसके लिए जरूरी था उनका नीति निर्धारिकों में शामिल होना और उसके लिए जरूरत थी उनके बेहद शिक्षित होने की.

लिहाज़ा बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में बेहद होशियार बाबा साहब ने उस वक्‍त पढ़ाई लिखाई में अपना बेहद मन लगाया और देश-दुनिया के सर्वश्रेष्‍ठ शिक्षण संस्‍थानों से समाजशास्त्र, राजनीतिक शास्त्र, अर्थशास्‍त्र एवं अन्‍य विषयों में डिग्रियां हासिल कीं.

आइये जानते हैं डॉ. आंबेडकर के शिक्षा जीवन एवं उपलब्धियों के बारे में…

स्कूल/विद्यालय- सतारा स्कूल, महाराष्ट्र, भारत एवं सरकारी हाई स्कूल, एल्फिंस्टोन

महाविद्यालय/विश्वविद्यालय…

बॉम्बे विश्वविद्यालय
कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क
लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स
ग्रेसिन्न, लंदन
बर्लिन विश्वविद्यालय
ओस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद, भारत

डिग्रियां

बॉम्बे विश्वविद्यालय से स्नातक
बॉम्बे विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र, राजनीतिक शास्त्र, अर्थशास्त्र और मानव विज्ञान में परास्नातक
कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क से पीएच.डी.
लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से एम.एससी.
ग्रेसिन्न, लंदन से बैरिस्टर (Barrister-at-law)
लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से डी. एससी.
कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क से एलएल.डी.
ओस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद, भारत से डी.लिट.

Dr. BR Ambedkar Education Qualification and Degrees

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डॉ. आंबेडकर की मूर्ति पर डाली जूतों की माला, चेहरे पर बांधा अपमानजनक टिप्‍पणियों वाला पोस्‍टर

अंतरराष्‍ट्रीय श्रमिक दिवस के मौके पर जब देश-दुनिया डॉ. बीआर आंबेडकर (Dr. BR Ambedkar) को याद कर रही थी, उसी दिन तमिलनाडु (Tamil Nadu) के कुड्डालोर (Cuddalore) शहर में एक शर्मनाक घटना सामने आई.

यहां कुड्डालोर में भारती रोड पर डॉ. आंबेडकर की कांस्य प्रतिमा पर उपद्रवियों ने जूते की एक माला डाल दी. साथ ही उन्‍होंने मूर्ति के चेहरे पर पर अपमानजनक टिप्पणियों वाला एक पोस्टर भी बांध दिया.

इसकी जानकारी मिलते ही क्षेत्रीय पार्टी विदुथलाई चिरुथिगाल काची (वीसीके) के कार्यकर्ता घटनास्थल पर पहुंचे और पोस्टर के साथ-साथ जूते की माला को भी हटा दिया. प्रतिमा की सफाई करने वाले ने कहा, “यह घटना शुक्रवार सुबह के समय में हुई थी. हम इसकी निंदा करते हैं.”

उसने यह भी कहा कि उपद्रवियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए. घटना के मद्देनजर वीसीके काडरों द्वारा एक विरोध प्रदर्शन भी किया गया.