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Dalit udham singh martyrdom day who killed General Michael O Dwyer

पढ़ें- जनरल डायर को मारने वाले ‘दलित’ शहीद उधम सिंह की पूरी प्रेरक कहानी…

नई दिल्‍ली : जघन्‍य जलियांवाला बाग हत्याकांड (Jallianwala Bagh Massacre) की प्रतिक्रिया में शहीद-ए-आजम भगत सिंह (Bhagat Singh) से प्रेरणा ग्रहण कर लंदन जाकर जनरल माइकल ओ डायर (General Michael O’Dwyer) की हत्‍या करने वाले अमर सपूत शहीद उधम सिंह (Udham Singh) दलित (Dalit) ही थे. शहीद उधम सिंह (Dalit Udham Singh) को बहुत कम लोग जानते हैं. दलित (Dalit) होने की वजह से इतिहास में उन्हें वो जगह नहीं मिल पाई, जिसके वह असली हकदार थे. साल 1940 में 31 जुलाई को उधम सिंह को इंग्‍लैंड में फांसी दी गई. आइये जानते हैं उनके बारे में कुछ खास तथ्‍य…

बताया जाता है कि शहीद उधम सिंह के पिता का नाम चूहड़ राम था, जो उत्तर प्रदेश के एटा जिले के पटिआली गांव के रहने वाले थे. वह जाटव (चमार) जाति Jatav (Chamar) के थे. चूहड़राम जी काम की तलाश में पंजाब के पटियाला चले गए थे और उन्होंने सिख धर्म अपना लिया था. उनका नाम वहां टहल सिंह हो गया था. यहीं पर 26 दिसंबर, 1899 को माता नारायणा कौर की कोख से क्रांतिकारी बालक उधम सिंह का जन्म हुआ.

दलित (Dalit) उधम सिंह (Udham Singh) के माता पिता का देहांत तब हुआ, जब वह 5-6 वर्ष की आयु में ही थे. अनाथ होने पर उधम सिंह और उनके भाई अमृतसर (Amritsar) में अनाथालय में चले गए. यहीं उनकी पढ़ाई, पालन-पोषण हुआ.

13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन डॉ. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी और रोल्ट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सभा रखी गई थी. इसमें हजारों लोग मौजूद थे. उधम सिंह यहां सबको पानी पिलाने का काम कर रहे थे.

इस सभा से पंजाब का गवर्नर माइकल ओ डायर गुस्‍साया हुआ था. उसने अपने 90 सैनिकों को लेकर जलियांवाला बाग को चारों तरफ से घेर लिया. यहां उसने निहत्थे लोगों पर गोलियां चलवा दीं, जिसमें हज़ारों लोग मारे गए.

उधम सिंह (Udham Singh) ने इस जनसंहार को अपनी आंखों से देखा और उसी वक्‍त इसका बदला लेने की ठान ली. उधम सिंह, भगत सिंह की क्रांतिकारी गतिविधियों से बहुत ज्‍यादा प्रभावित थे. वह भगत सिंह को अपना करीबी दोस्त मानते थे. भगत सिंह को फांसी दिए जाने के बाद वह अक्सर यही कहते थे कि मेरा दोस्त मुझे छोड़कर चला गया है. मुझे जल्दी जाकर उससे मिलना है.

21 साल की उम्र में उन्होंने 13 मार्च, 1940 को जलियांवाला बाग नरसंहार (Jallianwala Bagh Massacre) के जिम्‍मेदार जनरल माइकल ओ डायर को कैक्सटन हाल में गोली मार दी थी. इसमें डायर और उसके दो अंगरंक्षकों की मृत्यु हुई थी. इसे अंजाम देने के लिए उधम सिंह ने एक मोटी किताब के पन्नों को रिवाल्वर के आकार में काटा था और उसमें वहां खरीदी रिवाल्वर छिपाकर हाल के भीतर प्रवेश कर गए थे.

इस घटना से ब्रिटिश हुकूमत पूरी तरह हिल गई. लंदन की कोर्ट में मामले के ट्रायल के दौरान उधम सिंह ने जज एटकिंग्सन के सामने जिरह करते हुए कहा था- ‘मैंने भारत में ब्रिटिश हुकूमत के दौरान बच्चों को कुपोषण से मरते देखा है. जलियांवाला बाग जैसा नरसंहार (General Michael O’Dwyer) भी अपनी आंखों से देखा है. लिहाजा मुझे कोई दुख नहीं है. चाहे मुझे 10-20 साल की सजा दी जाए या फांसी पर लटका दिया जाए. मेरी प्रतिज्ञा अब पूरी हो चुकी है. अब मैं अपने वतन के लिए शहीद होने को तैयार हूं.’

अदालत में उनसे यह भी पूछा गया कि घटनास्‍थल पर डायर के अन्य साथी भी मौजूद थे, वह उनको भी मार सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया? इसके जवाब में उधम सिंह ने कहा था कि वहां पर कई महिलाएं मौजूद थीं और वो महिलाओं पर हमला नहीं करते. बताया जाता है उनकी इस बात को सुन जज भी अचं‍भित रह गए.

जज ने उधम सिंह को फांसी की सजा सुनाई. फांसी की सजा सुनने के बाद क्रान्तिवीर उधम सिंह ने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा लगाते हुए अपने मुल्‍क भारत के लिए हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ने की अपनी मंशा जता दी और 31 जुलाई 1940 को वीर उधम सिंह को ब्रिटेन की ‘पेंटनवीले जेल’ में फांसी दे दी गई. देश के बाहर फांसी की सजा पाने वाले उधम सिंह दूसरे क्रांतिकारी थे.

1965 में कांशीराम ने डॉ. अम्बेडकर के जन्मदिन पर सार्वजनिक अवकाश रद्द करने के विरोध में संघर्ष किया.

बहुजन आंदोलन के नायक कांशीराम और उनके 2 अधूरे सपने

नई दिल्ली. बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के संस्थापक कांशीराम (Kanshi Ram) ने 1981 में दलित शोषित समाज (Dalit Society and Kanshi Ram) संघर्ष समिति या डीएस4 की स्थापना की थी. कांशीराम के जीवन के बारे में कई किताबें लिखी गई हैं. हालांकि कांशीराम के जीवन के कुछ ऐसे पहलू भी हैं, जिन्हें हर कोई नहीं जानता है. आज हम आपको कांशीराम के उन 2 सपनों के बारे में बताने जा रहे हैं जो किन्हीं कारणों से अधूरे रह गए.

पहला सपना

14 अप्रैल 1984 को मान्यवर कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की. उनका नारा था जो बहुजन की बात करेगा ओ दिल्ली पर राज करेगा. उनके सामाजिक और राजनीतिक विचारों से शोषित समाज में जागृति आने लगी और दलित, पिछड़े तथा अल्पसंख्यक सत्ता प्राप्ति के लिए तैयार होने लगे.

कांशी राम का कहना था कि “हमारा एक मात्र लक्ष्य इस देश पर शासन करना है. इसके लिए वे निरन्तर प्रयास करते रहे दलितों में चेतना जगाने के लिए साहेब कांशीराम ने कई हजार किलोमीटर साइकिल से यात्रा की. इस मकसद में वे धीरे-धीरे आगे बढ़ते जा रहे थे. यूपी में सरकार भी बना डाली और धीरे-धीरे वे दिल्ली की ओर बढ़ ही रहे थे कि उनके स्वास्थ्य ने उनका साथ नहीं दिया. 2003 में वे सक्रिय राजनीति से दूर हो गए और मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. और उनके जीते जी देश का शासक बनने का सपना अधूरा रह गया.

दूसरा सपना

जिस तरह बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने निश्चय किया था कि वे हिन्दू धर्म में मरेंगे नहीं. अंततः 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया. ठीक उसी प्रकार साहेब कांशीराम ने भी 2002 में ये प्रण लिया था कि 14 अक्टूबर 2006 को डॉ. आंबेडकर के बौद्ध धर्म ग्रहण करने के 50 वी वर्ष गांठ पर वे 5 करोड़ अनुयायियों के साथ धर्मांतरण कर बौद्ध धर्म अपना लेंगे. मगर ये सपना भी उनका सपना ही रह गया.

 

 

Dalit UP DGP Brijlal

एक दलित IPS, जिससे कांपते थे क्रिमिनल, बना एक राज्‍य का पुलिस मुखिया

भारत में बहुतेरी दलित (Dalit) प्रतिभाएं हैं, जिनका जन्‍म गरीब परिवार में हुआ, बचपन संघर्ष में बीता, लेकिन अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर उन्‍होंने एक मुकाम हासिल किया. इस तरह ये सफल दलित आज देश-दुनिया के सामने एक मिसाल हैं.

इन्‍हीं शख्सियतों में से एक हैं आईपीएस बृजलाल (IPS Brijlal). इनकी गिनती सफल पुलिस अधिकारियों में की जाती है.

आईपीएस बृजलाल का जन्‍म सिद्धार्थनगर (Siddharthnagar) के छोटे से गांव गुजरौलिया खालसा में हुआ. वे बेहद गरीब परिवार में जन्मे. वह अनुसूचित जाति की कोरी जाति से ताल्‍लुक रखते हैं.

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यूपी के पूर्व डीजीपी रहे बृजलाल तेजतर्रार आईपीएस अफसरों में गिने जाते हैं. 1977 बैच के आईपीएस अधिकारी बृजलाल का नाम ऐसा है कि यूपी का शायद ही कोई ऐसा जिला हो, जहां अपराधी उनके नाम से वाकिफ ना हों.

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यूपी में सरकारें चाहे जिसकी भी रहीं, हर किसी ने उनकी कानून व्‍यवस्‍था संभालने, प्रशासनिक क्षमता, अपराधियों से निपटने के जज्‍बे को देखते हुए हमेशा कानून-व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी.

वह शख्‍स, जो अपनी का‍बिलियत के दम पर बना देश का पहला दलित मुख्‍यमंत्री

वैसे उन्‍हें बसपा सरकार की सख्त कानून-व्यवस्था का चेहरा माना जाता है. उनकी पहली तैनाती 1982 में बतौर एसपी जालौन रही. जालौन में तैनाती के दौरान उन्होंने कई दस्यु गिरोहों जैसे पूरन सिंह, मलखान सिंह जैसे कुख्यात गिरोहों से मोर्चा लिया. इसके बाद सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने साल 1989 में इटावा का एसएसपी भी बनाया. तत्कालीन सीएम कल्याण सिंह ने उन्हें साल 1991 में मेरठ में एसएसपी बनाया था. वह पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की सरकार में लखनऊ के एसपी सिटी बने.

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वह सबसे लंबे समय तक पहले प्रदेश ADG कानून-व्यवस्था, फिर स्पेशल डीजी और फिर DGP यानि पुलिस प्रमुख बनाए गए.​ अक्टूबर 2011 में बृजलाल को यूपी डीजीपी बनाया गया. साल 2014 में वह रिटायर हुए.

बृजलाल अकेले ऐसे आईपीएस अधिकारी रहे, जिन्‍होंने पीलीभीत के एसएसपी रहने के दौरान आतंकियों का पीछा किया और ऐसा करते हुए वह पंजाब तक जा पहुंचे. अपने दो सिपाहियों को मारने वाले आतंकियों को उन्‍होंने अंजाम तक पहुंचाया.

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इसी वजह से वह आतंकियों की हिट लिस्ट में आए. केंद्रीय खुफिया एजेंसियों की सिफारिश पर उन्हें लंबे समय तक सुरक्षा दी गई. केंद्र ने उन्हें 25 आदमियों की लंबी-चौड़ी सुरक्षा 10 साल तक दी.

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