बहुजन आंदोलन के नायक कांशीराम और उनके 2 अधूरे सपने

1965 में कांशीराम ने डॉ. अम्बेडकर के जन्मदिन पर सार्वजनिक अवकाश रद्द करने के विरोध में संघर्ष किया.

नई दिल्ली. बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के संस्थापक कांशीराम (Kanshi Ram) ने 1981 में दलित शोषित समाज (Dalit Society and Kanshi Ram) संघर्ष समिति या डीएस4 की स्थापना की थी. कांशीराम के जीवन के बारे में कई किताबें लिखी गई हैं. हालांकि कांशीराम के जीवन के कुछ ऐसे पहलू भी हैं, जिन्हें हर कोई नहीं जानता है. आज हम आपको कांशीराम के उन 2 सपनों के बारे में बताने जा रहे हैं जो किन्हीं कारणों से अधूरे रह गए.

पहला सपना

14 अप्रैल 1984 को मान्यवर कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की. उनका नारा था जो बहुजन की बात करेगा ओ दिल्ली पर राज करेगा. उनके सामाजिक और राजनीतिक विचारों से शोषित समाज में जागृति आने लगी और दलित, पिछड़े तथा अल्पसंख्यक सत्ता प्राप्ति के लिए तैयार होने लगे.

कांशी राम का कहना था कि “हमारा एक मात्र लक्ष्य इस देश पर शासन करना है. इसके लिए वे निरन्तर प्रयास करते रहे दलितों में चेतना जगाने के लिए साहेब कांशीराम ने कई हजार किलोमीटर साइकिल से यात्रा की. इस मकसद में वे धीरे-धीरे आगे बढ़ते जा रहे थे. यूपी में सरकार भी बना डाली और धीरे-धीरे वे दिल्ली की ओर बढ़ ही रहे थे कि उनके स्वास्थ्य ने उनका साथ नहीं दिया. 2003 में वे सक्रिय राजनीति से दूर हो गए और मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. और उनके जीते जी देश का शासक बनने का सपना अधूरा रह गया.

दूसरा सपना

जिस तरह बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने निश्चय किया था कि वे हिन्दू धर्म में मरेंगे नहीं. अंततः 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया. ठीक उसी प्रकार साहेब कांशीराम ने भी 2002 में ये प्रण लिया था कि 14 अक्टूबर 2006 को डॉ. आंबेडकर के बौद्ध धर्म ग्रहण करने के 50 वी वर्ष गांठ पर वे 5 करोड़ अनुयायियों के साथ धर्मांतरण कर बौद्ध धर्म अपना लेंगे. मगर ये सपना भी उनका सपना ही रह गया.

 

 

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